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न्याय की शुरुआत संवाद से, हर जरूरतमंद तक पहुंचे कानूनी मदद: CJI

इंदौरः भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने कहा है कि न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल अदालतों में लंबित मामलों का निपटारा करना नहीं, बल्कि समाज के उस हर व्यक्ति तक न्याय की पहुंच सुनिश्चित करना है, जो किसी कारण से अपने अधिकारों के लिए आवाज नहीं उठा पा रहा है। उन्होंने कहा कि न्याय […]

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  • August 10, 2026 12:57 pm IST, Published 1 hour ago

इंदौरः भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने कहा है कि न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल अदालतों में लंबित मामलों का निपटारा करना नहीं, बल्कि समाज के उस हर व्यक्ति तक न्याय की पहुंच सुनिश्चित करना है, जो किसी कारण से अपने अधिकारों के लिए आवाज नहीं उठा पा रहा है। उन्होंने कहा कि न्याय तक पहुंच की पहली सीढ़ी संवाद है और जरूरतमंद व्यक्ति को यह भरोसा होना चाहिए कि व्यवस्था उसकी बात सुनेगी और सम्मान के साथ समाधान का रास्ता उपलब्ध कराएगी।
इंदौर में आयोजित नालसा (NALSA) के पश्चिमी क्षेत्रीय सम्मेलन में CJI सूर्यकांत ने कानूनी सहायता व्यवस्था की भूमिका पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि देश में कानूनी मदद की व्यवस्था को केवल मुकदमों के निपटारे तक सीमित नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। इसका व्यापक उद्देश्य ऐसे लोगों को न्यायिक व्यवस्था से जोड़ना है, जो आर्थिक, सामाजिक या किसी अन्य कारण से अपने अधिकारों के लिए अदालत तक पहुंचने में कठिनाई महसूस करते हैं।

मुख्य न्यायाधीश ने न्यायिक व्यवस्था में संवाद और संवेदनशीलता की जरूरत पर जोर दिया। उनके मुताबिक, किसी व्यक्ति के लिए अदालत या कानूनी प्रक्रिया तक पहुंचना कई बार अपने आप में बड़ी चुनौती होती है। ऐसे में कानूनी सहायता से जुड़े संस्थानों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे जरूरतमंद व्यक्ति को केवल कानूनी सलाह ही न दें, बल्कि उसकी समस्या को समझें और उसे उचित मंच तक पहुंचाने में सहयोग करें।

उन्होंने कहा कि न्याय की अवधारणा तभी सार्थक होगी, जब समाज के अंतिम व्यक्ति को भी यह महसूस हो कि कानून उसके लिए उपलब्ध है। इसके लिए कानूनी सेवा संस्थाओं, वकीलों, न्यायिक अधिकारियों और स्वयंसेवकों को मिलकर काम करना होगा। उन्होंने इस प्रयास को एक ऐसी ‘न्याय की सेना’ के रूप में देखने की बात कही, जिसका लक्ष्य समाज के कमजोर और वंचित वर्गों तक कानूनी सहायता पहुंचाना हो।

CJI ने यह भी संकेत दिया कि कानूनी सहायता के क्षेत्र में तकनीक और नए माध्यमों का इस्तेमाल बढ़ाना समय की जरूरत है। डिजिटल संसाधनों की मदद से ऐसे लोगों तक भी पहुंच बनाई जा सकती है, जो भौगोलिक दूरी या अन्य बाधाओं के कारण परंपरागत कानूनी सेवाओं तक आसानी से नहीं पहुंच पाते। हालांकि, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि तकनीक के साथ मानवीय संवेदना का संतुलन भी जरूरी है।

सम्मेलन में न्याय तक समान पहुंच, कानूनी जागरूकता और जरूरतमंदों को समय पर सहायता उपलब्ध कराने जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। इस दौरान यह विचार प्रमुख रहा कि न्याय केवल अदालत का फैसला हासिल करने का नाम नहीं है, बल्कि व्यक्ति को उसकी समस्या के समाधान की पूरी प्रक्रिया में भरोसा, जानकारी और सम्मान मिलना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

CJI सूर्यकांत ने कहा कि कानूनी सहायता का अंतिम लक्ष्य समाज में ऐसा वातावरण बनाना होना चाहिए, जहां कोई व्यक्ति केवल संसाधनों की कमी के कारण न्याय से वंचित न रहे। उन्होंने न्यायिक और कानूनी सेवा तंत्र से जुड़े लोगों से अपेक्षा की कि वे अपनी भूमिका को केवल पेशेवर जिम्मेदारी तक सीमित न रखें, बल्कि इसे सामाजिक दायित्व के रूप में भी देखें।

इस संदेश के साथ सम्मेलन ने न्याय तक पहुंच को अधिक व्यापक, संवेदनशील और समावेशी बनाने की दिशा में सामूहिक प्रयास की जरूरत को रेखांकित किया। CJI का जोर इस बात पर रहा कि न्याय व्यवस्था की सफलता का वास्तविक पैमाना यही है कि समाज के सबसे जरूरतमंद व्यक्ति तक भी इंसाफ कितनी आसानी और गरिमा के साथ पहुंचता है।

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