नई दिल्ली। भारत में बाल गोद लेने (एडॉप्शन) के क्षेत्र से एक उत्साहजनक खबर सामने आई है। केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (CARA) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के बीच देशभर में 5,022 बच्चों को गोद लिया गया, जो पिछले एक दशक का सबसे बड़ा आंकड़ा है।
CARA के मुताबिक, वर्ष 2024-25 में जहां 4,515 बच्चों को गोद लिया गया था, वहीं 2025-26 में यह संख्या बढ़कर 5,022 हो गई। इनमें 4,603 बच्चों को भारत के भीतर ही परिवार मिला, जबकि 419 बच्चों को विदेशी परिवारों ने गोद लिया।
रिपोर्ट के अनुसार, गोद लिए गए बच्चों में 2,756 लड़कियां, 2,263 लड़के और 3 अन्य श्रेणी के बच्चे शामिल हैं। पिछले वर्ष की तुलना में लड़कियों को गोद लेने के मामलों में 8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
विशेष आवश्यकता (Special Needs) वाले बच्चों को गोद लेने के मामलों में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2025-26 में 392 विशेष जरूरतों वाले बच्चों को गोद लिया गया, जो पिछले वर्ष के 313 मामलों की तुलना में 25 प्रतिशत अधिक है।
इसके अलावा, रिश्तेदारों और सौतेले माता-पिता द्वारा गोद लेने के मामलों में भी बड़ा उछाल देखा गया। यह संख्या 820 से बढ़कर 1,231 हो गई, यानी करीब 50 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
CARA की मुख्य कार्यकारी अधिकारी भावना सक्सेना के अनुसार, इस सफलता का प्रमुख कारण CARA की ‘आइडेंटिफिकेशन सेल’ द्वारा स्पेशलाइज्ड एडॉप्शन एजेंसियों (SAAs) और चाइल्ड वेलफेयर कमेटियों (CWCs) के साथ बेहतर समन्वय रहा। इससे संस्थानों में रह रहे पात्र बच्चों को समय पर कानूनी रूप से गोद लेने के लिए उपलब्ध घोषित किया जा सका।
सरकार ने गोद लेने की प्रक्रिया को तेज और प्रभावी बनाने के लिए पिछले एक वर्ष में 118 नई चाइल्ड वेलफेयर कमेटियां गठित कीं और 52 नई स्पेशलाइज्ड एडॉप्शन एजेंसियों का पंजीकरण किया। वहीं जुलाई 2024 से अब तक कुल 266 नई एजेंसियां सक्रिय की गई हैं।
हालांकि, इस उपलब्धि के बावजूद चुनौतियां पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। वर्तमान में करीब 26 हजार परिवार गोद लेने की प्रतीक्षा सूची में हैं और 0 से 2 वर्ष के शिशुओं की संख्या सीमित होने के कारण माता-पिता को औसतन तीन साल तक इंतजार करना पड़ता है। वहीं, एडॉप्शन पूल में शामिल लगभग 80 प्रतिशत बच्चे विशेष जरूरतों वाले हैं।
विशेष जरूरतों वाले बच्चों को अपनाने के प्रति बढ़ती जागरूकता, सरकारी प्रयासों और समाज की बदलती सोच के कारण अब पहले की तुलना में अधिक बेसहारा बच्चों को सुरक्षित और स्नेहपूर्ण परिवार मिल रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही रफ्तार बनी रही तो आने वाले वर्षों में भारत में गोद लेने की प्रक्रिया और अधिक पारदर्शी, तेज और प्रभावी बन सकती है।