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विदेशों में काम कर रहे भारतीयों की बढ़ीं मौतें

 तीन साल में 800 से अधिक प्रवासियों ने गंवाई जान नई दिल्ली। विदेशों में रोजगार की तलाश में गए भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर एक चिंताजनक रिपोर्ट सामने आई है। भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) के आंकड़ों के अनुसार, साल 2023 से 2025 के बीच विदेशों में काम करने के दौरान 800 से अधिक भारतीय […]

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Gauravshali Bharat News
  • July 27, 2026 7:10 am IST, Published 58 minutes ago

 तीन साल में 800 से अधिक प्रवासियों ने गंवाई जान

नई दिल्ली। विदेशों में रोजगार की तलाश में गए भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर एक चिंताजनक रिपोर्ट सामने आई है। भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) के आंकड़ों के अनुसार, साल 2023 से 2025 के बीच विदेशों में काम करने के दौरान 800 से अधिक भारतीय प्रवासी मजदूरों की मौत हुई है। इनमें से करीब 55 प्रतिशत मौतें खाड़ी देशों में दर्ज की गईं, जहां औसतन हर सप्ताह लगभग तीन भारतीय मजदूरों की जान गई।

हाल ही में कतर में हुए विस्फोट में 12 भारतीयों की मौत के बाद प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और कार्यस्थलों पर मौजूद जोखिमों को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

सऊदी अरब में सबसे अधिक मौतें

विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, सऊदी अरब इस सूची में सबसे ऊपर है, जहां तीन वर्षों के दौरान 182 भारतीयों की मौत हुई। इसके बाद संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का स्थान है, जहां 128 भारतीय नागरिकों की जान गई। खाड़ी देशों से भारतीय प्रवासी मजदूरों की आत्महत्या के सबसे अधिक मामले भी सामने आए हैं।

सुरक्षा नियमों की अनदेखी बनी बड़ी वजह

तेलंगाना एनआरआई माइग्रेंट्स एसोसिएशन और विशेषज्ञों के अनुसार, इन मौतों के पीछे सबसे बड़ा कारण कार्यस्थलों पर सुरक्षा नियमों का पालन न होना है। कई मजदूर बिना हेलमेट, सुरक्षा जूते और अन्य सुरक्षा उपकरणों के काम करते हैं, जबकि कई कंपनियां भी सुरक्षा मानकों का पूरी तरह पालन नहीं करतीं।

भीषण गर्मी में काम से बढ़ता खतरा

खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय मजदूर निर्माण, वेयरहाउस, रिटेल और ऑटोमोबाइल जैसे जोखिम वाले क्षेत्रों में कार्यरत हैं। कई मजदूर 45 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान में काम करते हैं और बाद में अत्यधिक ठंडे कमरों में लौटते हैं। तापमान में अचानक होने वाला यह बड़ा अंतर स्वास्थ्य पर गंभीर असर डालता है।

मानसिक तनाव और आत्महत्या के मामले

रिपोर्ट के अनुसार, खराब रहने की व्यवस्था, निम्न गुणवत्ता का भोजन, लंबे समय तक परिवार से दूर रहना और आर्थिक परेशानियां भी प्रवासी मजदूरों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं।

कई मजदूरों को 12-12 घंटे की शिफ्ट में काम करना पड़ता है। कई मामलों में दो से तीन महीने तक वेतन नहीं मिलता, जबकि कुछ कंपनियां वेतन से मनमानी कटौती भी करती हैं। इससे मानसिक तनाव बढ़ता है और आत्महत्या जैसी घटनाएं सामने आती हैं।

मुआवजे से बचने की कोशिश

जानकारों का कहना है कि कुछ मामलों में कंपनियां काम के दौरान हुई मौतों को प्राकृतिक मौत बताकर अपनी जिम्मेदारी से बचने का प्रयास करती हैं। वहीं, बहुत कम कंपनियां बीमा के माध्यम से पीड़ित परिवारों को उचित मुआवजा देती हैं।

सरकार के प्रयास

विदेश मंत्रालय का कहना है कि विदेशों में रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा सरकार की प्राथमिकता है। इसके लिए दुबई, रियाद और जेद्दा सहित कई शहरों में प्रवासी भारतीय सहायता केंद्र संचालित किए जा रहे हैं। भारतीय दूतावासों के लेबर विंग नियमित रूप से श्रमिकों की समस्याएं सुनने के लिए कैंप और ओपन हाउस का आयोजन करते हैं।

महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ई-माइग्रेट पोर्टल के माध्यम से ईसीआर (ECR) पासपोर्ट धारक महिलाओं को केवल अधिकृत सरकारी एजेंसियों के जरिए ही खाड़ी देशों में भेजने की व्यवस्था लागू की गई है।

सुरक्षा और अधिकारों पर बढ़ा जोर

विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशों में काम करने वाले भारतीय मजदूरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए श्रम कानूनों का सख्ती से पालन, बेहतर कार्य परिस्थितियां, समय पर वेतन भुगतान और मानसिक स्वास्थ्य सहायता जैसी व्यवस्थाओं को और मजबूत करने की आवश्यकता है।

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