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बच्चों को इंटरनेट से दूर रखना गलत, सुप्रीम कोर्ट ने मौलिक अधिकार बताया

बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री के खिलाफ कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने उसकी पहचान और उसे हटाने की व्यवस्था प्रभावी बनाने पर भी जोर दिया। इसके तहत राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा डेटाबेस तैयार करने का निर्देश शामिल है, जिससे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर मौजूद अवैध सामग्री का पता लगाने और उसे हटाने में मदद मिल सके। इस पहल का उद्देश्य बच्चों को ऑनलाइन शोषण से बचाना और डिजिटल मंचों को अधिक सुरक्षित बनाना है।

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Supreme Court
Gauravshali Bharat News
  • October 17, 2026 2:20 pm IST, Published 58 minutes ago

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल और ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि इंटरनेट तक पहुंच से उन्हें पूरी तरह वंचित करना उचित समाधान नहीं है। अदालत ने माना कि इंटरनेट का इस्तेमाल संविधान के तहत मौलिक अधिकारों से जुड़ा है और बच्चों को भी इसका लाभ मिलना चाहिए। साथ ही, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है। अदालत के अनुसार, बच्चों की सुरक्षा और उनकी स्वतंत्रता को एक-दूसरे के विरोध में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि दोनों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने सोशल मीडिया और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बच्चों के यौन शोषण से संबंधित सामग्री को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान ये टिप्पणियां कीं। अदालत ने ऐसी आपत्तिजनक सामग्री की पहचान करने, उसे हटाने और दोबारा प्रसारित होने से रोकने के लिए व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दिया। इसके लिए तकनीकी उपायों और संबंधित एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता बताई गई।

सुनवाई के दौरान पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19(1)(a) का उल्लेख करते हुए इंटरनेट तक पहुंच को जीवन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़े अधिकारों के संदर्भ में देखा। अदालत का मानना है कि बच्चों को ऑनलाइन दुनिया से पूरी तरह दूर रखने के बजाय इंटरनेट को उनके लिए सुरक्षित बनाना अधिक प्रभावी तरीका हो सकता है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर मौजूद खतरों को दूर करने के लिए कंपनियों और संबंधित संस्थाओं को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।

अदालत ने यह भी बताया कि बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगाने से अनपेक्षित नुकसान हो सकता है। प्रतिबंधों के बावजूद बच्चे दूसरे तरीकों से इंटरनेट तक पहुंच सकते हैं और ऐसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर सकते हैं, जहां उनकी सुरक्षा के लिए पर्याप्त व्यवस्था न हो। इसके अलावा, यदि बच्चों को ऑनलाइन गतिविधियों से जुड़ी हर बात पर सजा या रोक का डर रहेगा, तो वे साइबर उत्पीड़न, धमकी या शोषण का सामना करने पर माता-पिता और भरोसेमंद लोगों से मदद मांगने में हिचक सकते हैं।

पीठ ने इंटरनेट के सकारात्मक पहलुओं पर भी ध्यान दिलाया। इंटरनेट बच्चों के लिए शिक्षा, जानकारी, रचनात्मक अभिव्यक्ति और संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम है। दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए ऑनलाइन संसाधन कई बार पढ़ाई और नई जानकारी हासिल करने का प्रमुख साधन बनते हैं। विशेष जरूरतों वाले बच्चों को भी इंटरनेट के जरिए समान परिस्थितियों वाले लोगों से जुड़ने और अपने अनुभव साझा करने का अवसर मिलता है। इसलिए बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के उपाय ऐसे होने चाहिए, जो उनकी सीखने और आगे बढ़ने की संभावनाओं को खत्म न करें।

अदालत ने अपने फैसले में वर्ष 2020 के अनुराधा भसीन और वर्ष 2025 के प्रज्ञा प्रसून मामलों का भी संदर्भ दिया। इन फैसलों के माध्यम से इंटरनेट तक पहुंच, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और डिजिटल सुविधाओं के महत्व पर चर्चा की गई थी। मौजूदा मामले में पीठ ने बच्चों की उम्र के अनुरूप सुरक्षा उपाय अपनाने की जरूरत बताई। इनमें सोशल मीडिया अकाउंट बनाने के लिए माता-पिता की सहमति, अभिभावकों की निगरानी और बच्चों के अकाउंट को डिफॉल्ट रूप से निजी रखने जैसे विकल्प शामिल हैं।

इसके अतिरिक्त, बच्चों को दिखाए जाने वाले विज्ञापनों और ऑनलाइन सामग्री पर नियंत्रण तथा कम उम्र के बच्चों के लिए अलग चाइल्ड मोड उपलब्ध कराने जैसे सुझाव भी दिए गए। अदालत ने स्पष्ट किया कि ये संभावित उपाय हैं और इन्हें किस तरह लागू किया जाए, इस पर केंद्र सरकार उचित निर्णय ले सकती है। सरकार बच्चों को वयस्कों के लिए बनी सामग्री और अन्य हानिकारक ऑनलाइन सेवाओं से बचाने के लिए आवश्यक प्रतिबंधों पर भी विचार कर सकती है।

बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री के खिलाफ कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने उसकी पहचान और उसे हटाने की व्यवस्था प्रभावी बनाने पर भी जोर दिया। इसके तहत राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा डेटाबेस तैयार करने का निर्देश शामिल है, जिससे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर मौजूद अवैध सामग्री का पता लगाने और उसे हटाने में मदद मिल सके। इस पहल का उद्देश्य बच्चों को ऑनलाइन शोषण से बचाना और डिजिटल मंचों को अधिक सुरक्षित बनाना है। अदालत की टिप्पणियों से स्पष्ट है कि बच्चों के लिए इंटरनेट पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बजाय सुरक्षित डिजिटल वातावरण तैयार करना महत्वपूर्ण है। इसके लिए सरकार, सोशल मीडिया कंपनियों, अभिभावकों और समाज को मिलकर काम करना होगा, ताकि बच्चों को इंटरनेट के लाभ मिलें और वे ऑनलाइन खतरों से भी सुरक्षित रह सकें।

 

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