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तिरुप्परनकुंड्रम दीप विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा

मदुरै: तमिलनाडु सरकार ने तिरुप्परनकुंड्रम पहाड़ी पर कार्तिगई दीपम जलाने की अनुमति से जुड़े मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। यह मामला धार्मिक परंपराओं, ऐतिहासिक विरासत और प्रशासनिक अधिकारों से जुड़ा होने के कारण राज्य में व्यापक चर्चा का विषय बना हुआ है। तिरुप्परनकुंड्रम पहाड़ी, जो तिरुप्परनकुंड्रम […]

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  • June 23, 2026 5:27 pm IST, Published 1 hour ago

मदुरै: तमिलनाडु सरकार ने तिरुप्परनकुंड्रम पहाड़ी पर कार्तिगई दीपम जलाने की अनुमति से जुड़े मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। यह मामला धार्मिक परंपराओं, ऐतिहासिक विरासत और प्रशासनिक अधिकारों से जुड़ा होने के कारण राज्य में व्यापक चर्चा का विषय बना हुआ है।

तिरुप्परनकुंड्रम पहाड़ी, जो तिरुप्परनकुंड्रम पहाड़ी क्षेत्र में स्थित है, धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसी पहाड़ी पर स्थित  ब्रमण्या स्वामी मंदिर भगवान मुरुगन के छह प्रमुख तीर्थस्थलों (अरुपडई वीड़ु) में से एक माना जाता है। हर वर्ष कार्तिगई दीपम के अवसर पर यहां श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचते हैं और पारंपरिक रूप से दीप प्रज्ज्वलित किए जाते रहे हैं।

तमिलनाडु सरकार ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की है, जिसमें तिरुप्परनकुंड्रम पहाड़ी पर दरगाह के पास दीप (कार्तिगई दीपम) जलाने की अनुमति दी गई थी। मदुरै के पास तिरुप्परनकुंड्रम पहाड़ी। यहां सुब्रमण्या स्वामी मंदिर है, जो भगवान मुरुगन के छह प्रमुख स्थानों में से एक है। पहाड़ी पर एक प्राचीन पत्थर का स्तंभ है, जिसे परंपरागत रूप से दीप जलाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था।

विवाद का केंद्र पहाड़ी पर स्थित एक प्राचीन पत्थर का स्तंभ है, जिसके बारे में दावा किया जाता है कि इसका उपयोग सदियों से कार्तिगई दीपम जलाने के लिए किया जाता रहा है। हिंदू संगठनों और श्रद्धालुओं का कहना है कि यह परंपरा स्थानीय धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। उनका तर्क है कि दीप प्रज्ज्वलन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान से भी जुड़ा हुआ है।

दूसरी ओर, पहाड़ी पर स्थित दरगाह क्षेत्र के आसपास गतिविधियों को लेकर विभिन्न पक्षों के बीच मतभेद सामने आए हैं। इसी संदर्भ में अदालत में याचिकाएं दायर की गई थीं। सुनवाई के दौरान यह मुद्दा उठा कि क्या पारंपरिक रूप से जिस स्थान पर दीप जलाए जाते रहे हैं, वहां श्रद्धालुओं को धार्मिक आयोजन की अनुमति दी जानी चाहिए।

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने मामले की सुनवाई के बाद संबंधित पक्षों को कुछ शर्तों के साथ कार्तिगई दीपम जलाने की अनुमति देने का आदेश दिया था। अदालत ने अपने आदेश में परंपरा, धार्मिक स्वतंत्रता और कानून-व्यवस्था के पहलुओं को ध्यान में रखने की बात कही थी। हालांकि राज्य सरकार का मानना है कि इस आदेश से भविष्य में प्रशासनिक और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां उत्पन्न हो सकती हैं।

इसी आधार पर तमिलनाडु सरकार ने अब सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की है। सरकार का कहना है कि संवेदनशील धार्मिक स्थलों पर किसी भी गतिविधि की अनुमति देते समय शांति, सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। राज्य प्रशासन का तर्क है कि ऐसे मामलों में स्थानीय परिस्थितियों और संभावित प्रभावों का व्यापक मूल्यांकन आवश्यक है।

उधर, दीप जलाने की परंपरा का समर्थन करने वाले संगठनों का कहना है कि यह धार्मिक अधिकारों और लंबे समय से चली आ रही परंपराओं का प्रश्न है। उनका दावा है कि ऐतिहासिक रूप से इस पहाड़ी पर दीप प्रज्ज्वलन की परंपरा रही है और इसे जारी रखने की अनुमति मिलनी चाहिए। समर्थकों का यह भी कहना है कि धार्मिक आयोजनों को नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन परंपराओं को पूरी तरह रोकना उचित नहीं होगा।

सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई इस बात को स्पष्ट कर सकती है कि धार्मिक परंपराओं, ऐतिहासिक दावों और प्रशासनिक अधिकारों के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाए। अदालत के निर्णय का असर केवल तिरुप्परनकुंड्रम तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश के अन्य धार्मिक और विरासत स्थलों से जुड़े मामलों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।

 

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