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यमुना सफाई मिशन को नई रफ्तार, MCD-NDDB ने मिलाया हाथ

नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में यमुना नदी की सफाई और जैविक कचरे के वैज्ञानिक प्रबंधन की दिशा में एक अहम पहल की गई है। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में दिल्ली नगर निगम (MCD) और राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) के बीच कंप्रेस्ड बायो-गैस (CBG) प्लांट स्थापित करने के लिए समझौता […]

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  • July 15, 2026 7:25 pm IST, Published 57 minutes ago

नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में यमुना नदी की सफाई और जैविक कचरे के वैज्ञानिक प्रबंधन की दिशा में एक अहम पहल की गई है। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में दिल्ली नगर निगम (MCD) और राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) के बीच कंप्रेस्ड बायो-गैस (CBG) प्लांट स्थापित करने के लिए समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए। इस पहल का उद्देश्य गोबर का बेहतर उपयोग कर स्वच्छता, ऊर्जा उत्पादन और पशुपालकों की आय बढ़ाना है।

कार्यक्रम में केंद्रीय पशुपालन एवं डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह, दिल्ली के उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू, मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता तथा केंद्र और दिल्ली सरकार के कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।

इस अवसर पर अमित शाह ने कहा कि यह समझौता केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य में देश के अन्य बड़े शहरों के लिए भी एक मॉडल के रूप में काम कर सकता है। उनका कहना था कि गोबर को अपशिष्ट मानने के बजाय संसाधन के रूप में उपयोग करने से स्वच्छता और ऊर्जा—दोनों क्षेत्रों में बड़ा बदलाव आएगा।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के यमुना नदी को स्वच्छ बनाने के संकल्प को पूरा करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है। सरकार का लक्ष्य है कि पशुओं के अपशिष्ट का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण किया जाए ताकि गोबर सीधे नदी या नालों में न पहुंचे और प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण हो सके।

शाह ने बताया कि राजधानी में सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट के उपचार के लिए लगभग 80 ट्रीटमेंट प्लांट्स पर काम शुरू हो चुका है। इसके साथ ही गोबर आधारित CBG परियोजनाओं को जोड़कर एक समग्र अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली विकसित की जा रही है। उन्होंने विश्वास जताया कि दिसंबर 2028 तक यमुना में गंदा पानी जाने से रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हासिल की जाएगी।

नई योजना के तहत नांगली, घोघा-गोयला और गाजीपुर जैसे क्षेत्रों में गोबर प्रसंस्करण सुविधाओं को विकसित किया जाएगा। इन संयंत्रों में गोबर से कंप्रेस्ड बायो-गैस तैयार की जाएगी, जिसका उपयोग स्वच्छ ईंधन के रूप में किया जा सकेगा। साथ ही बचा हुआ जैविक अवशेष खेती के लिए जैविक खाद के रूप में उपयोगी होगा।

इस पहल का एक महत्वपूर्ण पक्ष पशुपालकों को आर्थिक लाभ पहुंचाना भी है। समझौते के अनुसार गोबर उपलब्ध कराने वाले पशुपालकों को प्रति किलोग्राम गोबर के बदले भुगतान किया जाएगा। इससे डेयरी और पशुपालन से जुड़े लोगों की अतिरिक्त आय का स्रोत विकसित होगा।

यदि यह मॉडल सफल रहता है तो शहरी क्षेत्रों में ठोस एवं जैविक कचरे के प्रबंधन की नई व्यवस्था विकसित हो सकती है। इससे पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन और जैविक खेती को भी बढ़ावा मिलेगा। आने वाले समय में इस तरह की परियोजनाएं देश के अन्य महानगरों और बाद में ग्रामीण क्षेत्रों में भी लागू की जा सकती हैं।

 

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