तमिलनाडु की राजनीति में जो कुछ आज दिख रहा है, वह भारतीय लोकतंत्र के उस पुराने दौर की याद दिलाता है जब चुनाव सिर्फ़ जनादेश नहीं, बल्कि सत्ता के लिए गणित, सौदेबाज़ी और रणनीति का अखाड़ा बन जाया करते थे।
एक समय था जब देश की राजनीति में “हंग असेंबली” कोई असामान्य बात नहीं थी। लोकसभा से लेकर राज्यों तक, त्रिशंकु जनादेश सत्ता की स्थायी तस्वीर हुआ करता था। उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों ने लंबे समय तक ऐसी राजनीति देखी, जहाँ सरकारें जनता से ज़्यादा विधायकों की गिनती और समर्थन पत्रों पर टिकी रहती थीं।
उस दौर में छोटी पार्टियों और निर्दलीय विधायकों की अहमियत अचानक आसमान छूने लगती थी। मंत्री पद, मलाईदार मंत्रालय, राजनीतिक समझौते और बंद कमरों की बैठकों से सत्ता का रास्ता तय होता था। लोकतंत्र का चेहरा चुनावी मंचों पर कुछ और दिखता था, लेकिन असली खेल चुनाव नतीजों के बाद शुरू होता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह धारणा मजबूत हुई थी कि अब मतदाता निर्णायक जनादेश देने लगा है। जनता अस्थिरता, जोड़-तोड़ और खरीद-फ़रोख़्त से ऊब चुकी है। इसलिए राज्यों में स्पष्ट बहुमत की सरकारें बनने लगी थीं। ऐसा लगने लगा था कि गठबंधन युग का वह अराजक अध्याय पीछे छूट चुका है।
लेकिन तमिलनाडु ने अचानक उस पुराने राजनीतिक युग की वापसी करा दी है। जनता बदलाव चाहती थी। वह पारंपरिक द्रविड़ राजनीति के बीच एक नया विकल्प तलाश रही थी। नए चेहरों और नई संभावनाओं की चर्चा थी। मगर पुराने दलों ने भी पूरी ताकत झोंक दी। नतीजा यह हुआ कि जनता का बंटा हुआ जनादेश एक ऐसी त्रिशंकु विधानसभा में बदल गया जहाँ किसी के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है। और जैसे ही सत्ता अधर में लटकती है, राजनीति का असली रंग सामने आने लगता है।
वही दल जो कल तक एक-दूसरे के खिलाफ़ ज़हर उगल रहे थे, अब संभावित सहयोगी के तौर पर देखे जाने लगे हैं। कांग्रेस का अपने पुराने साथी डीएमके से अचानक दूरी बनाकर विजय के साथ जाने की चर्चाएँ हों या फिर कट्टर प्रतिद्वंद्वी डीएमके और एआईएडीएमके के बीच संभावित समझौते की अटकलें,सब कुछ संभव दिखने लगा है।
अब पूरी राजनीति “नंबर गेम” में सिमट गई है। हर विधायक की कीमत और महत्व रातों-रात बढ़ चुका है। फोन कॉल, गुप्त बैठकें, रणनीतिक चुप्पी और समर्थन जुटाने की कवायद तेज़ हो गई है। इसके साथ ही लौट आई है “रिजॉर्ट पॉलिटिक्स”। विधायकों को टूट-फूट और कथित हॉर्स ट्रेडिंग से बचाने के लिए सुरक्षित ठिकानों पर भेजा जा रहा है। लोकतंत्र का केंद्र विधानसभा से ज़्यादा होटल और रिसॉर्ट बनने लगते हैं।
राजभवन भी अचानक सत्ता संघर्ष का केंद्र बन जाता है। किसे सरकार बनाने का न्योता मिलेगा, किसके पास बहुमत साबित करने का मौका होगा, राज्यपाल की भूमिका क्या होगी—इन सवालों पर संवैधानिक बहस शुरू हो जाती है।
विडंबना यही है कि जिस जनता ने पुराने राजनीतिक ढर्रे से निकलने के लिए नया विकल्प खोजा था, उसे अंततः उसी जोड़-तोड़, उसी सत्ता संघर्ष और उसी राजनीतिक नाटक का सामना करना पड़ रहा है जिससे वह छुटकारा चाहती थी।
तमिलनाडु का यह घटनाक्रम सिर्फ़ एक राज्य की राजनीतिक कहानी नहीं है। यह उस सच की याद दिलाता है कि जब जनादेश बिखर जाता है, तब लोकतंत्र का सबसे अस्थिर और सबसे दिलचस्प चेहरा सामने आता है।