बेंगलुरु: कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के तिरुपति मंदिर की पहली आरती को लेकर दिए गए बयान पर नया विवाद खड़ा हो गया है। शिवकुमार ने कहा था कि तिरुपति मंदिर में होने वाली पहली नित्य आरती में सांसदों, विधायकों, मंत्रियों और राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले अन्य लोगों को भी शामिल होने की अनुमति देने के लिए प्रस्ताव लाया जाएगा।
शिवकुमार के इस बयान पर तिरुपति मंदिर बोर्ड के सदस्य जी. भानुप्रकाश रेड्डी ने कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि इस धार्मिक परंपरा को राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए। रेड्डी ने स्पष्ट किया कि पहली आरती में शामिल होने का विशेष अधिकार केवल मैसूर राजपरिवार को प्राप्त है और यह अधिकार किसी सरकार, कैबिनेट या जनप्रतिनिधियों के लिए नहीं है।
तिरुपति मंदिर का मैसूर राजपरिवार से ऐतिहासिक संबंध रहा है। मान्यता है कि मंदिर के विकास और संरक्षण में मैसूर के महाराज का महत्वपूर्ण योगदान रहा, जिसके चलते उनके राजपरिवार को भगवान वेंकटेश्वर की पहली नित्य आरती में शामिल होने का विशेषाधिकार मिला।
चूंकि राजपरिवार का कोई सदस्य हर समय तिरुपति में मौजूद नहीं रह सकता, इसलिए उनकी ओर से एक विशेष अधिकारी (स्पेशल ऑफिसर) इस परंपरा का निर्वहन करता है। डीके शिवकुमार इसी व्यवस्था में बदलाव कर राज्य के प्रतिनिधियों को भी शामिल करने की बात कर रहे हैं।
रविवार को बेंगलुरु में डीके शिवकुमार ने कहा कि उन्होंने इस विशेषाधिकार का दायरा बढ़ाने के निर्देश दिए हैं, ताकि मंत्री, विधायक, सांसद, न्यायाधीश और सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाले अन्य लोग भी भगवान वेंकटेश्वर की पहली आरती में शामिल होकर पूजा-अर्चना कर सकें। उन्होंने इसे अपने कार्यकाल की महत्वपूर्ण घोषणा बताया।
मंदिर बोर्ड के सदस्य जी. भानुप्रकाश रेड्डी ने कहा कि तिरुपति एक आस्था और आध्यात्मिकता का केंद्र है, इसलिए इसकी परंपराओं को राजनीतिक रंग नहीं दिया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि कर्नाटक की मांग स्वीकार की गई तो भविष्य में तमिलनाडु, केरल और अन्य राज्य भी इसी तरह के विशेषाधिकार की मांग कर सकते हैं, जिससे सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं पर असर पड़ सकता है।