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इलाहाबाद हाईकोर्ट दी राहत,सार्वजनिक अवकाश से नहीं रुकेगी वेतनवृद्धि

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेसिक शिक्षा विभाग में कार्यरत 1059 सहायक अध्यापकों की पहली वार्षिक वेतनवृद्धि से जुड़े विवाद में राज्य सरकार को उनके दावे पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि यदि किसी कर्मचारी की नियुक्ति हो चुकी है और सार्वजनिक अवकाश के कारण वह अगले कार्यदिवस पर कार्यभार […]

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  • August 27, 2026 3:10 pm IST, Published 1 hour ago

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेसिक शिक्षा विभाग में कार्यरत 1059 सहायक अध्यापकों की पहली वार्षिक वेतनवृद्धि से जुड़े विवाद में राज्य सरकार को उनके दावे पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि यदि किसी कर्मचारी की नियुक्ति हो चुकी है और सार्वजनिक अवकाश के कारण वह अगले कार्यदिवस पर कार्यभार ग्रहण करता है, तो केवल इस वजह से उसके सेवा लाभों को प्रभावित नहीं किया जा सकता।

यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकलपीठ ने सीमा राय और तीन अन्य समेत 16 याचिकाओं का निस्तारण करते हुए दिया। कोर्ट ने संबंधित सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया कि वह शिक्षकों की ओर से दिए गए व्यक्तिगत प्रतिवेदनों पर छह सप्ताह के भीतर विचार कर तर्कसंगत आदेश पारित करे।

मामला वर्ष 2016 में नियुक्त किए गए सहायक अध्यापकों की पहली वार्षिक वेतनवृद्धि से संबंधित है। इन शिक्षकों की नियुक्ति 28 जून 2016 को हुई थी। हालांकि, एक जुलाई को सार्वजनिक अवकाश होने के कारण वे उस दिन कार्यभार ग्रहण नहीं कर सके। उन्होंने अगले दिन यानी दो जुलाई को अपनी ज्वाइनिंग दी। इसी एक दिन के अंतर को लेकर बाद में वेतनवृद्धि की तारीख को लेकर विवाद खड़ा हुआ।

शिक्षकों का कहना था कि उनकी नियुक्ति 28 जून को ही हो चुकी थी। इसलिए वेतनवृद्धि के लिए उनकी नियुक्ति तिथि को आधार माना जाना चाहिए। उनके अनुसार, उन्हें पहली जनवरी 2017 से पहली वार्षिक वेतनवृद्धि का लाभ मिलना चाहिए था। दूसरी ओर, विभाग ने वास्तविक कार्यभार ग्रहण करने की तारीख दो जुलाई को आधार माना। इस आधार पर शिक्षकों को पहली वेतनवृद्धि एक जुलाई 2017 से दिए जाने की स्थिति सामने आई। इससे शिक्षकों को सेवा लाभ में करीब छह महीने का अंतर पड़ गया।

शिक्षकों ने अपने पक्ष में 22 दिसंबर 2016 के शासनादेश का हवाला दिया। इसके मुताबिक दो जनवरी से एक जुलाई के बीच नियुक्त कर्मचारियों को एक जनवरी से वेतनवृद्धि का लाभ मिलने का प्रावधान है, जबकि दो जुलाई से एक जनवरी के बीच नियुक्त कर्मचारियों को अगली एक जुलाई से वेतनवृद्धि मिलती है। याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि उनके मामले में दो जुलाई को योगदान की वजह उनकी इच्छा या लापरवाही नहीं थी। एक जुलाई को सार्वजनिक अवकाश होने के कारण वे उस दिन ज्वाइन नहीं कर सकते थे। इसलिए नियुक्ति के बाद अगले उपलब्ध कार्यदिवस पर कार्यभार ग्रहण करना उनके नियंत्रण से बाहर की परिस्थिति थी।

शिक्षकों की ओर से बेसिक शिक्षा परिषद, प्रयागराज के वित्त नियंत्रक के 20 नवंबर 2025 के पत्र का भी उल्लेख किया गया। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, इस पत्र में संबंधित शासनादेश में ‘नियुक्ति तिथि’ को महत्व दिए जाने की बात कही गई थी। इसके अलावा शिक्षकों ने वर्ष 2009 के शासनादेश का हवाला देते हुए कहा कि सार्वजनिक अवकाश के कारण अगले कार्यदिवस पर कार्यभार ग्रहण करने की स्थिति में कर्मचारी को सेवा हित से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। उनका कहना था कि जब छुट्टी की वजह से ज्वाइनिंग एक दिन आगे हुई, तो उस देरी का नकारात्मक प्रभाव उनकी वेतनवृद्धि पर नहीं पड़ना चाहिए।

राज्य सरकार की ओर से वास्तविक योगदान की तारीख यानी दो जुलाई को सेवा लाभ निर्धारित करने का तर्क दिया गया। हालांकि, अदालत ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए शिक्षकों के दावे पर पुनर्विचार का निर्देश दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि यहां एक दिन का अंतर सार्वजनिक अवकाश के कारण पैदा हुआ था और यह शिक्षकों के नियंत्रण से बाहर था। ऐसी स्थिति में केवल योगदान की तारीख के आधार पर उनके सेवा लाभ को प्रभावित करना उचित नहीं होगा।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वार्षिक वेतनवृद्धि कोई विवेकाधीन सुविधा नहीं है। यह सेवा नियमों के तहत निर्धारित अधिकार है और संबंधित नियमों के अनुसार इसका निर्धारण किया जाना चाहिए। हालांकि, कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि इस फैसले को हर मामले में नियुक्ति की तारीख को योगदान की तारीख से ऊपर रखने वाला सामान्य सिद्धांत नहीं माना जाएगा। संबंधित अधिकारी को प्रत्येक मामले की परिस्थितियों, नियुक्ति की तारीख, कार्यभार ग्रहण करने की तारीख और सार्वजनिक अवकाश की स्थिति को ध्यान में रखकर फैसला करना होगा।

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