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अवैध हिरासत पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, यूपी पुलिस को लगाई कड़ी फटकार

इस मामले में हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को भी निर्देश दिया कि पुलिसकर्मियों के प्रशिक्षण के लिए बेहतर मॉड्यूल तैयार किए जाएं। इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों में नागरिक स्वतंत्रता, गिरफ्तारी के कानूनी आधार और हिरासत से पहले अपनाई जाने वाली प्रक्रियाओं पर विशेष ध्यान देने को कहा गया है। अदालत का मानना है कि पुलिस अधिकारियों को कानून के प्रावधानों की स्पष्ट जानकारी होना जरूरी है, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके।

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  • October 17, 2026 4:30 pm IST, Published 1 hour ago

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक व्यक्ति को औपचारिक गिरफ्तारी से पहले हिरासत में रखने के मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने कहा कि कानून की निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन किए बिना किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाना गंभीर मामला है। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने दीपक नामक व्यक्ति की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार करते हुए उसकी हिरासत को अवैध करार दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।

हाई कोर्ट ने अपने 7 अक्टूबर के आदेश में नोएडा के सहायक पुलिस आयुक्त कमलेश कांत और जांच अधिकारी अनुज कुमार की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसा प्रतीत होता है कि संबंधित पुलिस अधिकारी स्वयं को कानून से ऊपर समझकर काम कर रहे हैं। पीठ ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के तहत गिरफ्तारी और हिरासत से जुड़ी प्रक्रियाओं की अनदेखी पर चिंता जताई। अदालत के अनुसार, किसी भी व्यक्ति को हिरासत में लेने और गिरफ्तार करने के लिए कानून में निर्धारित नियमों का पालन करना अनिवार्य है।

मामले की सुनवाई के दौरान सामने आए तथ्यों के मुताबिक, दीपक को प्राथमिकी दर्ज होने से पहले ही पुलिस हिरासत में रखा गया था। इसके बाद हिरासत के दौरान ही उसकी औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज की गई। अदालत ने इस घटनाक्रम को गंभीरता से लेते हुए गिरफ्तारी से संबंधित दस्तावेजों की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। पीठ ने कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ दस्तावेज बाद में तैयार किए गए थे और याचिकाकर्ता के हस्ताक्षर पहले खाली कागज पर लिए गए, जिनका इस्तेमाल बाद में गिरफ्तारी से जुड़े रिकॉर्ड तैयार करने में किया गया।

अदालत ने यह भी गौर किया कि गिरफ्तारी के आधार से संबंधित दस्तावेज में आवश्यक जानकारी वाला हिस्सा खाली छोड़े जाने की बात सामने आई। न्यायालय के मुताबिक, यदि किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी से संबंधित कानूनी औपचारिकताएं सही तरीके से पूरी नहीं की जातीं, तो इससे उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित होती है। पुलिस अधिकारियों के लिए यह आवश्यक है कि वे गिरफ्तारी के कारणों और उससे संबंधित कानूनी प्रक्रिया का उचित रिकॉर्ड रखें, ताकि हिरासत की वैधता पर सवाल न उठें।

पीठ ने उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली पर व्यापक टिप्पणी करते हुए कहा कि उसके सामने बार-बार ऐसे मामले आ रहे हैं, जिनमें कानून की अनिवार्य प्रक्रियाओं का पूरी तरह पालन नहीं किया जाता। अदालत ने इस स्थिति को गंभीर बताते हुए कहा कि पुलिस अधिकारियों को नागरिकों के अधिकारों और कानूनी जिम्मेदारियों के प्रति अधिक संवेदनशील होना चाहिए। गिरफ्तारी किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीधे प्रभावित करती है, इसलिए इसमें किसी भी तरह की मनमानी की अनुमति नहीं दी जा सकती।

इस मामले में हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को भी निर्देश दिया कि पुलिसकर्मियों के प्रशिक्षण के लिए बेहतर मॉड्यूल तैयार किए जाएं। इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों में नागरिक स्वतंत्रता, गिरफ्तारी के कानूनी आधार और हिरासत से पहले अपनाई जाने वाली प्रक्रियाओं पर विशेष ध्यान देने को कहा गया है। अदालत का मानना है कि पुलिस अधिकारियों को कानून के प्रावधानों की स्पष्ट जानकारी होना जरूरी है, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके।

बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का उद्देश्य किसी व्यक्ति को अवैध हिरासत से राहत दिलाना है। ऐसे मामलों में अदालत यह जांच करती है कि किसी व्यक्ति को हिरासत में रखने के लिए कानूनी आधार मौजूद है या नहीं। दीपक के मामले में हाई कोर्ट ने उपलब्ध तथ्यों के आधार पर हिरासत को गैरकानूनी माना और सशर्त तत्काल रिहाई का निर्देश दिया।

अदालत की इस टिप्पणी से स्पष्ट संदेश गया है कि पुलिस को जांच और गिरफ्तारी के दौरान कानून के दायरे में रहकर ही कार्रवाई करनी होगी। अपराध की जांच करना पुलिस का दायित्व है, लेकिन इस प्रक्रिया में नागरिकों के मौलिक अधिकारों और निर्धारित कानूनी सुरक्षा उपायों की अनदेखी नहीं की जा सकती। हाई कोर्ट ने प्रशिक्षण में सुधार का निर्देश देकर यह भी रेखांकित किया कि कानून का पालन सुनिश्चित करना पुलिस प्रशासन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

 

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