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श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में बदली अर्चकों की पोशाक, परंपरागत वस्त्रों में दिखेंगे

अयोध्या: श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में 15 अगस्त से अर्चकों के लिए नई वेशभूषा व्यवस्था लागू कर दी गई है। अब मंदिर में पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान अर्चक निर्धारित पारंपरिक वस्त्रों में नजर आएंगे। नई व्यवस्था के तहत अर्चकों के लिए पीले रंग का उत्तरीय और बिना सिले पारंपरिक वस्त्र निर्धारित किए गए हैं। […]

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  • August 16, 2026 10:17 am IST, Published 28 seconds ago

अयोध्या: श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में 15 अगस्त से अर्चकों के लिए नई वेशभूषा व्यवस्था लागू कर दी गई है। अब मंदिर में पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान अर्चक निर्धारित पारंपरिक वस्त्रों में नजर आएंगे। नई व्यवस्था के तहत अर्चकों के लिए पीले रंग का उत्तरीय और बिना सिले पारंपरिक वस्त्र निर्धारित किए गए हैं। मंदिर प्रशासन की ओर से लागू की गई इस व्यवस्था का उद्देश्य धार्मिक मर्यादा, अनुशासन और वेशभूषा में एकरूपता बनाए रखना बताया जा रहा है।

नई वेशभूषा को रामानंदाचार्य परंपरा और वैष्णव धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप रखा गया है। मंदिर में होने वाले दैनिक पूजा-पाठ से लेकर विशेष धार्मिक आयोजनों के दौरान अर्चक इसी निर्धारित पोशाक में पूजा संपन्न करेंगे। इसके साथ ही मंदिर की धार्मिक परंपरा और अनुष्ठानों की गरिमा को ध्यान में रखते हुए वस्त्रों के स्वरूप को पारंपरिक रखा गया है।

15 अगस्त से नई व्यवस्था लागू होने के बाद मंदिर में अर्चकों की वेशभूषा में बदलाव साफ तौर पर दिखाई दिया। विशेष रूप से झूलनोत्सव के दौरान अर्चक पीले उत्तरीय और पारंपरिक बिना सिले वस्त्रों में नजर आए। धार्मिक आयोजन के दौरान एक जैसी वेशभूषा ने मंदिर परिसर के वातावरण में अनुशासन और एकरूपता का स्वरूप भी प्रस्तुत किया।

मंदिर की पूजा परंपरा में वेशभूषा का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होने वाले अर्चकों के लिए पारंपरिक वस्त्रों का इस्तेमाल लंबे समय से विभिन्न वैष्णव परंपराओं का हिस्सा रहा है। ऐसे में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में निर्धारित पोशाक को भी इसी धार्मिक परंपरा से जोड़कर देखा जा रहा है। नई व्यवस्था में पीले रंग के उत्तरीय को विशेष रूप से शामिल किया गया है। भारतीय धार्मिक परंपराओं में पीले रंग को शुभता और धार्मिक भाव से जोड़ा जाता है। वैष्णव परंपरा में भी पीले रंग का विशेष महत्व माना जाता है। यही वजह है कि अर्चकों की वेशभूषा में पीले उत्तरीय को प्रमुख स्थान दिया गया है।

बिना सिले पारंपरिक वस्त्रों का निर्धारण भी धार्मिक परंपराओं के अनुरूप किया गया है। पूजा और अनुष्ठान के दौरान अर्चकों के लिए ऐसी वेशभूषा रखी गई है, जो पारंपरिक धार्मिक आचार-विचार के अनुरूप हो। इससे मंदिर में होने वाली पूजा पद्धति और अर्चकों की वेशभूषा के बीच सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया गया है।

अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि देश-दुनिया के श्रद्धालुओं के लिए प्रमुख तीर्थस्थल भी है। यहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान श्रीराम के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में मंदिर की व्यवस्थाओं में अनुशासन और एकरूपता को महत्वपूर्ण माना जाता है। अर्चकों के लिए तय ड्रेस कोड भी इसी व्यापक व्यवस्था का हिस्सा है।

मंदिर में पूजा-अर्चना के दौरान अर्चकों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। वे दैनिक आरती, पूजा और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों को निर्धारित परंपराओं के अनुसार संपन्न कराते हैं। ऐसे में उनकी वेशभूषा भी मंदिर की धार्मिक पहचान का हिस्सा बनती है। नई व्यवस्था के जरिए अर्चकों की पोशाक को एक समान स्वरूप देने का प्रयास किया गया है।

झूलनोत्सव जैसे विशेष धार्मिक आयोजनों में भी अर्चकों ने नई वेशभूषा धारण की। इस दौरान पीले उत्तरीय और पारंपरिक वस्त्रों में अर्चकों की मौजूदगी ने धार्मिक आयोजन के स्वरूप को और अधिक पारंपरिक रूप दिया। श्रद्धालुओं के लिए भी यह बदलाव आकर्षण का विषय रहा।

नई वेशभूषा व्यवस्था लागू होने के बाद अब मंदिर में होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान अर्चक निर्धारित पोशाक में ही नजर आएंगे। इसका उद्देश्य किसी आधुनिक फैशन या बाहरी बदलाव के बजाय मंदिर की धार्मिक परंपरा के अनुरूप एक व्यवस्थित वेशभूषा तय करना है।

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में लगातार व्यवस्थाओं को धार्मिक परंपराओं और अनुशासन के अनुरूप विकसित किया जा रहा है। अर्चकों के लिए नई वेशभूषा इसी क्रम में उठाया गया कदम है। पीला उत्तरीय और बिना सिले पारंपरिक वस्त्र अब मंदिर की पूजा व्यवस्था का हिस्सा बन गए हैं। इससे धार्मिक मर्यादा, परंपरा और अर्चकों की वेशभूषा में एकरूपता को बनाए रखने पर जोर दिया गया है।

 

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