गौतमबुद्धनगर के छिजारसी गांव में बिजली व्यवस्था को लेकर सामने आई जानकारी ने सरकारी तंत्र की निगरानी और कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गांव में बड़ी संख्या में ऐसे बिजली कनेक्शन संचालित होने की बात सामने आई है, जिनकी वैधता पर सवाल हैं। बताया गया है कि करीब 13 हजार कनेक्शन अवैध तरीके से चल रहे हैं। खास बात यह है कि कई घरों के बाहर बिजली के मीटर भी लगे हुए हैं, जिससे पहली नजर में यह व्यवस्था सामान्य दिखाई देती है।
मामला तब गंभीर हो गया जब यह जानकारी सामने आई कि इन कनेक्शनों के जरिए हर महीने बड़ी रकम की वसूली की जा रही है। आरोप है कि बिजली इस्तेमाल करने वाले लोगों से नियमित तौर पर पैसे लिए जाते हैं, लेकिन यह रकम सरकारी राजस्व में जमा होने के बजाय कथित तौर पर एक संगठित सिंडिकेट तक पहुंच रही है। यदि जांच में यह आरोप सही साबित होते हैं, तो इससे न केवल सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचने का मामला बनता है, बल्कि बिजली विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठेंगे।
इस पूरे मामले की जानकारी स्टेट ट्रांसफॉर्मेशन कमीशन के CEO मनोज कुमार सिंह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने रखी। बैठक में जब छिजारसी में चल रही इस कथित अवैध बिजली व्यवस्था की जानकारी सामने आई, तो मुख्यमंत्री ने मामले को गंभीरता से लिया। उन्होंने पावर कॉरपोरेशन के चेयरमैन आशीष गोयल से इस संबंध में जवाब मांगा और बिजली विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर नाराजगी जताई।
मुख्यमंत्री के सामने मामला उठने के बाद ऊर्जा विभाग के अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई। अधिकारियों को अपने क्षेत्र में इतने बड़े पैमाने पर कथित अवैध कनेक्शनों की जानकारी क्यों नहीं मिली, यह एक अहम सवाल है। यदि घरों के बाहर मीटर लगे थे और बिजली की खपत नियमित रूप से हो रही थी, तो विभागीय रिकॉर्ड और जमीनी स्थिति के बीच अंतर कैसे बना रहा, इसकी भी जांच जरूरी मानी जा रही है।
मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू कथित वसूली का नेटवर्क है। हजारों कनेक्शनों से हर महीने रकम एकत्र किए जाने की बात सामने आने के बाद यह सवाल उठ रहा है कि इस व्यवस्था को संचालित करने वाले लोग कौन हैं और उन्हें संरक्षण कहां से मिल रहा था। साथ ही यह भी पता लगाने की जरूरत होगी कि कनेक्शन लगाने, मीटर उपलब्ध कराने और बिजली आपूर्ति जारी रखने में किन स्तरों पर लापरवाही या मिलीभगत हुई।
सरकार के लिए अब चुनौती केवल अवैध कनेक्शनों की पहचान तक सीमित नहीं है। पूरे नेटवर्क की जांच कर यह पता लगाना भी जरूरी होगा कि सरकारी बिजली का इस्तेमाल किस तरह किया जा रहा था और उससे संबंधित भुगतान किस व्यवस्था के तहत लिया जा रहा था। इसके साथ ही यह आकलन भी किया जा सकता है कि लंबे समय से चल रही इस व्यवस्था से सरकारी राजस्व को कितना संभावित नुकसान हुआ।
मामले में कार्रवाई होने पर स्थानीय स्तर पर बिजली व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। हालांकि, किसी भी व्यक्ति या अधिकारी की जिम्मेदारी जांच पूरी होने और संबंधित तथ्यों की पुष्टि के बाद ही तय की जानी चाहिए। फिलहाल मुख्यमंत्री के स्तर पर मामला उठने से ऊर्जा विभाग पर निगरानी और जवाबदेही बढ़ गई है।
छिजारसी का मामला यह सवाल भी सामने लाता है कि आधुनिक मीटरिंग व्यवस्था और डिजिटल बिजली रिकॉर्ड के बावजूद यदि बड़े पैमाने पर अनियमितताएं लंबे समय तक बनी रहें, तो निगरानी तंत्र में सुधार की जरूरत है। अब देखना होगा कि सरकार जांच के बाद किन लोगों पर कार्रवाई करती है और कथित अवैध कनेक्शनों तथा वसूली के नेटवर्क को खत्म करने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।