पिथौरागढ़: भारत-तिब्बत सीमा व्यापार एक बार फिर अनिश्चितता में फंस गया है। नेपाल के व्यापारियों को तिब्बत की पुरंग (तकलाकोट) मंडी में कारोबार की अनुमति मिल चुकी है, लेकिन भारतीय व्यापारी अब भी चीन की अंतिम मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं। मंजूरी में हो रही देरी के कारण उत्तराखंड के गुंजी में रखा करीब 3 हजार क्विंटल गुड़ और मिश्री लगातार बारिश और सीलन की वजह से खराब होने की कगार पर पहुंच गया है।
कोरोना महामारी के बाद इस वर्ष भारत-तिब्बत व्यापार दोबारा शुरू होने की उम्मीद थी। तकलाकोट व्यापार के लिए 134 भारतीय व्यापारियों ने आवेदन किया था। प्रशासन अब तक 100 व्यापारियों और उनके सहायकों को ट्रेड पास जारी कर चुका है। सभी व्यापारियों को 8 जुलाई को लिपुलेख दर्रे के रास्ते तकलाकोट रवाना होना था, लेकिन चीन की अंतिम मंजूरी नहीं मिलने से पूरा कार्यक्रम रोक दिया गया।
अनुमति मिलने में लगातार हो रही देरी के चलते 11 जुलाई को 28 से अधिक व्यापारी अपना सामान गुंजी में छोड़कर वापस धारचूला लौट आए। व्यापारियों का कहना है कि गुंजी में लंबे समय तक रुकने के लिए पर्याप्त भोजन, आवास और अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। उन्होंने कहा कि जैसे ही चीन की ओर से अनुमति मिलेगी, वे दोबारा गुंजी पहुंच जाएंगे।
गुंजी में रखा लगभग 3 हजार क्विंटल गुड़ और मिश्री लगातार बारिश और नमी के कारण खराब होने के खतरे में है। यदि जल्द अनुमति नहीं मिली, तो व्यापारियों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
चीनी अधिकारियों के अनुसार, पुरंग (तकलाकोट) मंडी में भारतीय व्यापारियों के लिए अभी पर्याप्त दुकानें और अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। उनका कहना है कि सभी व्यवस्थाएं पूरी होने के बाद ही भारतीय व्यापारियों को व्यापार की अनुमति दी जाएगी।
भारत-चीन व्यापार समिति के अध्यक्ष जीवन सिंह रौंकली ने कहा कि चीन ने नेपाल के व्यापारियों को पुरंग मंडी में व्यापार की अनुमति दे दी है, जबकि भारतीय व्यापारियों को अब तक प्रवेश की मंजूरी नहीं मिली है। उन्होंने इसे भारतीय व्यापारियों के साथ भेदभावपूर्ण रवैया बताया।
एसडीएम आशीष जोशी ने बताया कि प्रशासन ने चीन से अनुरोध किया है कि भारतीय व्यापारियों को बिना सामान के तिब्बत जाकर वहां की व्यवस्थाओं का निरीक्षण करने की अनुमति दी जाए। फिलहाल चीन की ओर से जवाब का इंतजार किया जा रहा है।
लिपुलेख दर्रे के माध्यम से भारत और तिब्बत के बीच सदियों पुराना पारंपरिक व्यापार होता रहा है। वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद यह व्यापार बंद हो गया था, जिसे 1992 में तकलाकोट (पुरंग) मंडी के जरिए दोबारा शुरू किया गया। हालांकि कोरोना महामारी के दौरान 2019 के बाद से यह व्यापार फिर बंद है। छह साल बाद व्यापार शुरू होने की उम्मीद जगी थी, लेकिन चीन की मंजूरी में देरी से व्यापारियों की चिंता बढ़ गई है।