काठमांडू: नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के नेतृत्व को लेकर सत्ता संभालने के करीब 150 दिनों बाद सवाल उठने लगे हैं। जिस युवा नेतृत्व से देश में नई राजनीति और बदलाव की उम्मीद की गई थी, उसके सामने अब कई चुनौतियां खड़ी दिखाई दे रही हैं। संसद में कम मौजूदगी, विदेश नीति से जुड़े विवाद, घरेलू तनाव और पार्टी के स्तर पर बढ़ती दूरी ने सरकार की कार्यशैली पर चर्चा तेज कर दी है।
बालेन शाह की लोकप्रियता की शुरुआत काठमांडू के मेयर के रूप में उनके कामकाज से हुई थी। पारंपरिक राजनीतिक दलों से अलग छवि और युवा नेतृत्व के कारण उन्होंने नेपाल के युवाओं के बीच मजबूत पहचान बनाई। 2025 के Gen-Z आंदोलन के बाद उनकी लोकप्रियता और बढ़ी। बाद में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के चुनाव अभियान में उनकी सक्रिय भूमिका ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया। मार्च 2026 के चुनाव के बाद वह प्रधानमंत्री बने।
सत्ता में आने के बाद सरकार के कुछ फैसलों को लेकर लोगों की नाराजगी सामने आई। भारत से नेपाल आने वाले सामानों की जांच और कस्टम व्यवस्था को सख्त किए जाने के बाद सीमावर्ती इलाकों में विरोध देखने को मिला। नेपाल के बड़ी संख्या में लोग रोजमर्रा की जरूरतों, दवाओं और घरेलू सामान के लिए भारतीय बाजारों पर निर्भर रहते हैं। विरोध बढ़ने के बाद सरकार को अपने फैसले में बदलाव करना पड़ा। इस घटनाक्रम ने सरकार की नीतियों और उनके व्यावहारिक असर को लेकर बहस छेड़ दी।
विदेश नीति भी बालेन शाह सरकार के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बनी। भारत-नेपाल सीमा से जुड़े मुद्दों पर उनके बयानों को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रिया हुई। विपक्ष ने सरकार से स्थिति स्पष्ट करने की मांग की। इसके बाद अगस्त में शाह ने भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव और चीनी राजदूत झांग माओमिंग से अलग-अलग मुलाकात की। इन बैठकों को नेपाल की विदेश नीति में संतुलन साधने की कोशिश के तौर पर देखा गया।
घरेलू स्तर पर भी सरकार को तनावपूर्ण परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। जुलाई के अंतिम दिनों में नेपाल के तराई क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव और हिंसा की घटनाओं ने चिंता बढ़ाई। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़ा। इस घटनाक्रम ने सरकार के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने और विभिन्न समुदायों के बीच भरोसा कायम करने की चुनौती रख दी।
प्रधानमंत्री की संसद में मौजूदगी भी चर्चा का विषय बनी हुई है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, शाह ने कार्यभार संभालने के बाद शुरुआती 39 संसदीय बैठकों में केवल पांच में हिस्सा लिया। विपक्ष ने उनकी कम उपस्थिति को लेकर सवाल उठाए और प्रधानमंत्री से सदन में आकर सांसदों के प्रश्नों का जवाब देने की मांग की। नेपाल के प्रतिनिधि सभा के स्पीकर ने भी शाह को 26 अगस्त को सदन में उपस्थित होने के लिए कहा है।
पार्टी संगठन से जुड़ा घटनाक्रम भी शाह की सक्रियता को लेकर सवाल खड़े कर रहा है। 21 अगस्त को राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक हुई। बैठक में स्थानीय चुनावों की तैयारी, संगठनात्मक मामलों और अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा होनी थी। शाह इस बैठक में शामिल नहीं हुए। इसके बजाय वह काठमांडू से पोखरा और फिर मुस्तांग की यात्रा पर चले गए। पार्टी की अहम बैठक से उनकी अनुपस्थिति को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा हुई।
सबसे अहम पहलू यह है कि शाह की शुरुआती राजनीतिक ताकत में युवाओं की बड़ी भूमिका रही है। Gen-Z आंदोलन के दौरान उन्हें बदलाव के प्रतीक के तौर पर देखा गया था। लेकिन बाद के महीनों में युवा समूहों के बीच सरकार की नीतियों को लेकर असंतोष की खबरें सामने आईं। कुछ प्रदर्शनों में प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग भी उठी। इससे संकेत मिलता है कि सरकार के सामने अपनी लोकप्रियता बनाए रखने के साथ-साथ ठोस नतीजे देने की चुनौती भी है।
अब बालेन शाह सरकार के सामने सबसे बड़ी परीक्षा शासन के स्तर पर दिखाई देने वाली है। संसद में सक्रिय भागीदारी, पार्टी संगठन के साथ बेहतर तालमेल, विदेश नीति में स्पष्टता और घरेलू तनाव को नियंत्रित करना सरकार की विश्वसनीयता के लिए अहम होगा। जिस युवा नेतृत्व से नेपाल में बदलाव की उम्मीद जगी थी, उसे अब उन अपेक्षाओं को नीतिगत फैसलों और प्रभावी प्रशासन में बदलकर दिखाना होगा।