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जोधपुर में श्री अर्धनारीश्वर मंदिर की भव्य प्राण-प्रतिष्ठा संपन्न

जाेधपुर: राजस्थान के जोधपुर स्थित रघुवंशपुरम आश्रम में गुरुवार को श्री अर्धनारीश्वर मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा का भव्य एवं ऐतिहासिक समारोह वैदिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुआ। वैदिक मंत्रोच्चार, शंखनाद, घंटियों की मधुर ध्वनि और पुष्पवर्षा के बीच आयोजित इस आध्यात्मिक महोत्सव में देशभर से आए संत-महात्माओं, वेदाचार्यों एवं हजारों श्रद्धालुओं ने भाग लेकर धार्मिक आस्था […]

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  • July 9, 2026 4:00 pm IST, Published 2 hours ago

जाेधपुर: राजस्थान के जोधपुर स्थित रघुवंशपुरम आश्रम में गुरुवार को श्री अर्धनारीश्वर मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा का भव्य एवं ऐतिहासिक समारोह वैदिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुआ। वैदिक मंत्रोच्चार, शंखनाद, घंटियों की मधुर ध्वनि और पुष्पवर्षा के बीच आयोजित इस आध्यात्मिक महोत्सव में देशभर से आए संत-महात्माओं, वेदाचार्यों एवं हजारों श्रद्धालुओं ने भाग लेकर धार्मिक आस्था का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया।

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इस पावन अवसर पर पूज्य श्री स्वामी गुरूशरणानन्द जी महाराज, पूज्य श्री स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज, पूज्य श्री स्वामी ज्ञानानन्द जी महाराज तथा पूज्य आचार्य बालकृष्ण जी महाराज का दिव्य सान्निध्य प्राप्त हुआ। संतों की उपस्थिति ने समारोह को और अधिक गरिमामय बना दिया। पूरे आश्रम परिसर में भक्तिमय वातावरण बना रहा तथा श्रद्धालुओं ने भगवान अर्धनारीश्वर के दर्शन कर सुख, शांति और समृद्धि की कामना की।

समारोह के दौरान संत श्री मुरलीधर जी महाराज ने सभी पूज्य संतों का अभिनंदन करते हुए कहा कि यह केवल एक मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि मानवता को संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देने वाला आध्यात्मिक उत्सव है। उन्होंने कहा कि संतों का सान्निध्य मनुष्य के जीवन को नई दिशा प्रदान करता है। उनके आशीर्वाद से समाज में प्रेम, सद्भाव और आध्यात्मिक चेतना का विस्तार होता है।

अपने प्रेरणादायी उद्बोधन में संतों ने अर्धनारीश्वर के दिव्य स्वरूप का महत्व बताते हुए कहा कि भगवान शिव और शक्ति का अभिन्न स्वरूप संपूर्ण सृष्टि के संतुलन, समानता, करुणा, शक्ति, विवेक और प्रेम का सनातन प्रतीक है। शिव चेतना का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि शक्ति सृजन और अभिव्यक्ति का स्वरूप हैं। दोनों का समन्वय ही जीवन को पूर्णता प्रदान करता है और यही भारतीय संस्कृति का मूल संदेश है।

पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि अर्धनारीश्वर का संदेश प्रत्येक व्यक्ति के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने भीतर के शिवत्व और शक्ति दोनों को जागृत करना चाहिए। जब विवेक और करुणा, संकल्प और संवेदना, शक्ति और प्रेम का समन्वय होता है, तब व्यक्ति केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित नहीं रहता बल्कि समाज और राष्ट्र के कल्याण का माध्यम बन जाता है।

उन्होंने वर्तमान समय की चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि आज परिवार, समाज और विश्व अनेक प्रकार के वैचारिक, सामाजिक और मानसिक संघर्षों का सामना कर रहे हैं। ऐसे समय में अर्धनारीश्वर का संदेश और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। यह स्वरूप हमें सिखाता है कि स्त्री और पुरुष प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों के बीच न किसी का आधिपत्य है और न किसी की अधीनता, बल्कि परस्पर सम्मान, सहयोग और सह-अस्तित्व का भाव ही स्वस्थ समाज की आधारशिला है।

संतों ने कहा कि भारतीय सनातन संस्कृति समानता से भी आगे बढ़कर एकात्मता का संदेश देती है। अर्धनारीश्वर का स्वरूप इसी दिव्य दर्शन का जीवंत प्रतीक है, जो समाज में समरसता, संतुलन और आध्यात्मिक जागरण का मार्ग प्रशस्त करता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से अपने जीवन में इन मूल्यों को अपनाने का आह्वान किया।

पूरे आयोजन के दौरान वैदिक अनुष्ठान, पूजा-अर्चना, हवन एवं धार्मिक कार्यक्रम श्रद्धा और अनुशासन के साथ संपन्न हुए। श्रद्धालुओं ने भगवान अर्धनारीश्वर के दर्शन कर परिवार, समाज और राष्ट्र की सुख-समृद्धि की कामना की। आयोजन के सफल संचालन में आश्रम के सेवकों और स्वयंसेवकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

रघुवंशपुरम आश्रम में संपन्न श्री अर्धनारीश्वर मंदिर की यह प्राण-प्रतिष्ठा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति के उन शाश्वत मूल्यों को पुनः स्थापित करने का प्रयास है, जो संतुलन, समरसता, सह-अस्तित्व और आध्यात्मिक चेतना पर आधारित हैं। श्रद्धालुओं का मानना है कि यह मंदिर आने वाले समय में देशभर के भक्तों के लिए आस्था, साधना और आध्यात्मिक प्रेरणा का प्रमुख केंद्र बनेगा तथा समाज को एकता, प्रेम और मानव कल्याण का संदेश देता रहेगा।

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