कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में विश्व प्रसिद्ध दुर्गा पूजा की तैयारियां अब तेज़ हो गई हैं। शहर के ऐतिहासिक कुम्हारटोली (Kumartuli) में इन दिनों कलाकार पूरी श्रद्धा, समर्पण और महीनों की मेहनत के साथ मां दुर्गा की भव्य प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में जुटे हुए हैं। मिट्टी, बांस, पुआल और प्राकृतिक रंगों से तैयार की जा रही इन प्रतिमाओं को देश ही नहीं बल्कि विदेशों के विभिन्न दुर्गा पूजा पंडालों में भी स्थापित किया जाएगा।
हर वर्ष की तरह इस बार भी कुम्हारटोली की संकरी गलियों में सुबह से देर रात तक मूर्तिकारों की व्यस्तता देखने को मिल रही है। कहीं प्रतिमाओं का ढांचा तैयार किया जा रहा है तो कहीं बारीक नक्काशी, आभूषणों की सजावट और रंग-रोगन का काम चल रहा है। कलाकारों का कहना है कि दुर्गा पूजा उनके लिए केवल रोजगार का माध्यम नहीं बल्कि आस्था और संस्कृति का सबसे बड़ा पर्व है।
दुर्गा पूजा पश्चिम बंगाल की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस अवसर पर कोलकाता सहित पूरे राज्य में हजारों पंडाल सजाए जाते हैं। इन पंडालों की सबसे बड़ी आकर्षण मां दुर्गा की कलात्मक प्रतिमाएं होती हैं, जिन्हें बनाने का कार्य मुख्य रूप से कुम्हारटोली के कलाकार करते हैं। यहां की मूर्तिकला अपनी बारीक डिजाइन, पारंपरिक शैली और उत्कृष्ट शिल्पकला के कारण पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है।
विशेषज्ञों के अनुसार, एक प्रतिमा तैयार करने की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है। सबसे पहले बांस और पुआल से ढांचा बनाया जाता है। इसके बाद गंगा किनारे की विशेष मिट्टी से प्रतिमा का आकार तैयार किया जाता है। मिट्टी सूखने के बाद कलाकार चेहरे की भाव-भंगिमा, हाथों की मुद्रा और अन्य कलात्मक हिस्सों को बेहद सावधानी से गढ़ते हैं। अंत में रंगाई, वस्त्र, आभूषण और अन्य सजावटी सामग्री से प्रतिमा को आकर्षक रूप दिया जाता है।
इस वर्ष देश के विभिन्न राज्यों के अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर और खाड़ी देशों में आयोजित होने वाली दुर्गा पूजा समितियों ने भी कुम्हारटोली के कलाकारों को बड़ी संख्या में प्रतिमाओं के ऑर्डर दिए हैं। इससे स्थानीय कलाकारों और कारीगरों में उत्साह का माहौल है। उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संस्कृति और दुर्गा पूजा की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है।
मूर्तिकारों का कहना है कि प्रत्येक प्रतिमा में मां दुर्गा के साथ भगवान गणेश, मां लक्ष्मी, मां सरस्वती, भगवान कार्तिकेय और महिषासुर की आकृतियां भी बनाई जाती हैं। प्रतिमाओं की ऊंचाई और डिजाइन संबंधित पूजा समितियों की मांग के अनुसार तय की जाती है। कई समितियां पारंपरिक शैली को प्राथमिकता देती हैं, जबकि कुछ आधुनिक थीम के अनुरूप विशेष डिजाइन तैयार कराती हैं।
हालांकि, कलाकारों के सामने कई चुनौतियां भी हैं। मिट्टी, बांस, रंग, कपड़े और सजावटी सामग्री की बढ़ती कीमतों के कारण लागत में वृद्धि हुई है। इसके बावजूद अधिकांश मूर्तिकार गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं करना चाहते। उनका कहना है कि कुम्हारटोली की पहचान उत्कृष्ट शिल्पकला है और इसे बनाए रखना उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
दुर्गा पूजा के दौरान कोलकाता में लाखों श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं। शहर के प्रमुख पूजा पंडाल अपनी भव्य सजावट, सामाजिक संदेशों और अनूठी थीम के लिए प्रसिद्ध हैं। यही कारण है कि हर वर्ष देश-विदेश से बड़ी संख्या में लोग दुर्गा पूजा देखने पश्चिम बंगाल आते हैं। पर्यटन उद्योग को भी इससे महत्वपूर्ण आर्थिक लाभ मिलता है।
सांस्कृतिक विशेषज्ञों का मानना है कि दुर्गा पूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि भारतीय कला, संस्कृति और सामाजिक एकता का उत्सव है। कुम्हारटोली के कलाकार इस विरासत को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ा रहे हैं। उनके हाथों से तैयार होने वाली प्रतिमाएं करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनती हैं।
स्थानीय प्रशासन भी दुर्गा पूजा की तैयारियों को लेकर सक्रिय हो गया है। सुरक्षा व्यवस्था, यातायात प्रबंधन, साफ-सफाई और अन्य आवश्यक सुविधाओं की योजना बनाई जा रही है ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो। पूजा समितियां भी पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए प्राकृतिक और पर्यावरण-अनुकूल सामग्री के उपयोग को बढ़ावा दे रही हैं।
कुम्हारटोली में इन दिनों हर ओर मां दुर्गा की प्रतिमाओं के निर्माण का दृश्य श्रद्धा और कला का अद्भुत संगम प्रस्तुत कर रहा है। कलाकारों की मेहनत, परंपरा और रचनात्मकता इस बात का प्रमाण है कि दुर्गा पूजा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। आने वाले दिनों में जैसे-जैसे पूजा का समय नजदीक आएगा, इन प्रतिमाओं को देश और दुनिया के विभिन्न पूजा पंडालों तक पहुंचाया जाएगा, जहां भक्त पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मां दुर्गा का स्वागत करेंगे।