नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक स्थलों (पब्लिक प्लेस) पर पोर्नोग्राफी देखने पर रोक लगाने के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह कानूनी मामला नहीं बल्कि नीतिगत (पॉलिसी) विषय है, जिस पर फैसला केंद्र सरकार और विषय विशेषज्ञों को लेना चाहिए।
कानूनी प्रश्न नहीं: कोर्ट ने माना कि यह मुद्दा महत्वपूर्ण है, लेकिन इसमें ऐसा कोई कानूनी प्रश्न शामिल नहीं है जिस पर अदालत को विचार करना पड़े।
नीतिगत विषय: यह तकनीकी विकास और विशेषज्ञों के अध्ययन से जुड़ा नीतिगत मामला है, जो मुख्य रूप से सूचना मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आता है।
बेंच की सलाह: सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहन की बेंच ने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वे अपनी बात केंद्र सरकार के समक्ष रखें। अदालत ने यह भी कहा कि इस मामले में न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक नहीं है।
यह जनहित याचिका सामाजिक कार्यकर्ता बीएल जैन द्वारा दायर की गई थी, जिसमें केंद्र सरकार को विशेषकर नाबालिगों के बीच पोर्नोग्राफी की पहुंच रोकने के लिए राष्ट्रीय नीति और कार्ययोजना बनाने का निर्देश देने की मांग की गई थी।
याचिका के आंकड़े और दावे:
इंटरनेट पर हर सेकंड 5,000 पोर्न साइट्स देखी जाती हैं।
इंटरनेट के जरिए 2 करोड़ से ज्यादा पोर्न वीडियो या क्लिप्स जारी किए जा रहे हैं।
अश्लील सामग्री आसानी से उपलब्ध होने के कारण इसकी लत बढ़ रही है, जिससे यौन अपराधों में भी बढ़ोतरी हो रही है।
कानूनी हवाला: याचिका में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69A का हवाला देते हुए कहा गया था कि केंद्र सरकार के पास आपत्तिजनक ऑनलाइन सामग्री तक सार्वजनिक पहुंच को प्रतिबंधित करने की शक्ति है।