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देशी धान किस्मों के संरक्षण पर राज्यों और संस्थानों को बड़ी मदद

नई दिल्ली: भारत की जैव विविधता केवल पर्यावरणीय धरोहर ही नहीं, बल्कि कृषि, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव भी है। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए) ने चावल की देशी किस्मों के संरक्षण और उनके वैज्ञानिक उपयोग को प्रोत्साहन देने के लिए 8.22 करोड़ रुपये का लाभ-साझाकरण (Access […]

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  • August 3, 2026 12:13 pm IST, Published 1 hour ago

नई दिल्ली: भारत की जैव विविधता केवल पर्यावरणीय धरोहर ही नहीं, बल्कि कृषि, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव भी है। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए) ने चावल की देशी किस्मों के संरक्षण और उनके वैज्ञानिक उपयोग को प्रोत्साहन देने के लिए 8.22 करोड़ रुपये का लाभ-साझाकरण (Access and Benefit Sharing-ABS) वितरण किया है। यह राशि तीन प्रमुख अनुसंधान संस्थानों तथा 33 राज्य जैव विविधता बोर्डों और केंद्र शासित प्रदेशों की जैव विविधता परिषदों को दी गई है।

यह वितरण भारत में चावल की जैव विविधता से जुड़े सबसे बड़े एकल लाभ-साझाकरण कार्यक्रमों में शामिल माना जा रहा है। इसका उद्देश्य केवल आर्थिक सहायता देना नहीं, बल्कि उन संस्थानों और राज्यों को सम्मानित करना भी है जिन्होंने वर्षों से देशी चावल की किस्मों का संरक्षण किया और उन्हें वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए उपलब्ध कराया।

इस राशि का स्रोत एक अंतरराष्ट्रीय बीज कंपनी है, जिसने भारतीय चावल (Oryza sativa) की पारंपरिक किस्मों का उपयोग कर आधुनिक संकर (हाइब्रिड) बीज विकसित किए और उनका व्यावसायिक उपयोग किया। जैव विविधता अधिनियम के तहत ऐसे व्यावसायिक उपयोग से प्राप्त लाभ का एक हिस्सा उन संस्थाओं और समुदायों के साथ साझा किया जाता है, जिनके संरक्षण प्रयासों ने इन संसाधनों को सुरक्षित रखा।

अनुसंधान संस्थानों को मिला बड़ा हिस्सा

कुल 8.22 करोड़ रुपये में से लगभग 2.47 करोड़ रुपये अनुसंधान संस्थानों को दिए गए हैं। इनमें हैदराबाद स्थित आईसीएआर-भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान को सबसे अधिक लगभग 2.43 करोड़ रुपये प्राप्त हुए हैं। यह संस्थान लंबे समय से देशी चावल की विविध किस्मों के संरक्षण, अनुसंधान और नई तकनीकों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

इसके अलावा उत्तराखंड के गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय को भी उसके द्वारा संरक्षित विशेष चावल की किस्म के योगदान के लिए लगभग 3.26 लाख रुपये प्रदान किए गए हैं।

इन संस्थानों के लिए यह राशि केवल आर्थिक सहयोग नहीं, बल्कि उनके वर्षों के वैज्ञानिक कार्यों की मान्यता भी है। इस धन का उपयोग जर्मप्लाज्म संरक्षण, बीज संग्रहों के रखरखाव, नई किस्मों के अनुसंधान, वैज्ञानिक प्रशिक्षण और कृषि नवाचारों को बढ़ावा देने में किया जाएगा।

राज्यों को भी मिला लाभ

कुल राशि में से लगभग 5.75 करोड़ रुपये 33 राज्य जैव विविधता बोर्डों और केंद्र शासित प्रदेशों की परिषदों को आवंटित किए गए हैं। यह वितरण संबंधित राज्यों के धान उत्पादन क्षेत्र के आधार पर किया गया है।

सबसे अधिक राशि उत्तर प्रदेश को मिली, जिसे लगभग 73.26 लाख रुपये प्राप्त हुए। इसके बाद पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, ओडिशा, छत्तीसगढ़, पंजाब, बिहार, मध्य प्रदेश, असम और आंध्र प्रदेश प्रमुख लाभार्थियों में शामिल हैं।

राज्यों को मिली यह राशि स्थानीय स्तर पर जैव विविधता संरक्षण कार्यक्रमों, देशी धान किस्मों के संवर्धन, पारंपरिक कृषि ज्ञान के दस्तावेजीकरण, किसानों को प्रोत्साहन और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण जैसे कार्यों में खर्च की जाएगी।

लाभ-साझाकरण क्यों है महत्वपूर्ण?

जैव विविधता अधिनियम का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यदि किसी कंपनी या संस्था द्वारा भारत के जैविक संसाधनों का व्यावसायिक उपयोग किया जाता है, तो उससे होने वाले आर्थिक लाभ का उचित हिस्सा उन संस्थानों और समुदायों तक भी पहुंचे जिन्होंने इन संसाधनों का संरक्षण किया।

इसी व्यवस्था को “एक्सेस एंड बेनिफिट शेयरिंग” (ABS) कहा जाता है। यह मॉडल जैविक संसाधनों के उपयोग और संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करता है। इससे वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा मिलता है और स्थानीय समुदायों को भी आर्थिक लाभ प्राप्त होता है।

किसानों और ग्रामीण समुदायों को होगा फायदा

राज्य जैव विविधता बोर्ड इस धनराशि का उपयोग स्थानीय किसानों और पारंपरिक ज्ञान रखने वाले समुदायों को मजबूत करने के लिए करेंगे। कई क्षेत्रों में आज भी किसान दशकों पुरानी देशी धान किस्मों को संरक्षित किए हुए हैं। ये किस्में जलवायु परिवर्तन, रोग प्रतिरोधक क्षमता और पोषण के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।

इस पहल से किसानों को संरक्षण आधारित कृषि अपनाने की प्रेरणा मिलेगी। साथ ही स्थानीय बीजों के महत्व को भी नई पहचान मिलेगी।

जैव विविधता संरक्षण को मिलेगी नई गति

भारत दुनिया के सबसे समृद्ध जैव विविधता वाले देशों में शामिल है। यहां हजारों पारंपरिक फसल किस्में मौजूद हैं। बदलते मौसम और आधुनिक कृषि के दबाव के कारण कई देशी किस्में धीरे-धीरे समाप्त हो रही हैं। ऐसे में इस प्रकार की आर्थिक सहायता संरक्षण कार्यक्रमों को नई ऊर्जा दे सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक बीज भविष्य की खाद्य सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं। इसलिए उनका वैज्ञानिक संरक्षण और दस्तावेजीकरण समय की आवश्यकता है।

अब तक 162 करोड़ रुपये से अधिक का वितरण

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण के अनुसार कृषि और बीज क्षेत्र से अब तक लगभग 83 करोड़ रुपये लाभ-साझाकरण भुगतान के रूप में प्राप्त हुए हैं। यदि सभी क्षेत्रों को शामिल किया जाए तो एनबीए अब तक 162 करोड़ रुपये से अधिक का लाभ-साझाकरण वितरण कर चुका है।

यह आंकड़ा दर्शाता है कि भारत में जैव विविधता संरक्षण केवल पर्यावरणीय अभियान नहीं, बल्कि आर्थिक भागीदारी और सामाजिक न्याय का भी महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है।

वैश्विक लक्ष्यों की दिशा में भारत

यह पहल संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) और कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढांचे के अनुरूप भी है। विशेष रूप से यह शून्य भूख (SDG-2), जिम्मेदार उपभोग एवं उत्पादन (SDG-12), भूमि पर जीवन (SDG-15) तथा साझेदारी (SDG-17) जैसे लक्ष्यों को आगे बढ़ाने में मदद करती है।

यदि जैव विविधता संरक्षण और लाभ-साझाकरण की ऐसी व्यवस्थाएं लगातार मजबूत होती रहीं, तो भारत कृषि नवाचार, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की दिशा में और तेजी से आगे बढ़ सकेगा।

 

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