नई दिल्ली: वैश्विक खाद्य गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों के क्षेत्र में भारत ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। स्विट्जरलैंड के जिनेवा में आयोजित कोडेक्स एलीमेंटेरियस कमीशन (Codex Alimentarius Commission) में भारत की पहल और नेतृत्व में तैयार सात महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय खाद्य मानकों को मंजूरी मिली है। इनमें सबसे बड़ी उपलब्धि काजू के लिए पहली बार वैश्विक कोडेक्स मानक तैयार करने के प्रस्ताव को स्वीकृति मिलना है। इससे भारत के कृषि और खाद्य निर्यात क्षेत्र को नई मजबूती मिलने की उम्मीद है।
कोडेक्स एलीमेंटेरियस कमीशन संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का संयुक्त मंच है, जो खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता, सुरक्षा, लेबलिंग और व्यापार से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मानक तय करता है। इन मानकों को वैश्विक व्यापार में व्यापक स्वीकार्यता प्राप्त है और कई देश इन्हीं के आधार पर आयात-निर्यात संबंधी नियम बनाते हैं।
भारत की अगुवाई में तैयार सूखे धनिया और ताजे करी पत्ते के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों को भी इस सत्र में मंजूरी दी गई। भारतीय मसाले दुनिया भर में अपनी गुणवत्ता और स्वाद के लिए प्रसिद्ध हैं। ऐसे में इन उत्पादों के लिए वैश्विक मानक तय होने से भारतीय किसानों, मसाला उत्पादकों और निर्यातकों को बड़ा लाभ मिलने की संभावना है। इससे विभिन्न देशों में गुणवत्ता संबंधी तकनीकी बाधाएं कम होंगी और भारतीय उत्पादों की स्वीकार्यता बढ़ेगी।
बैठक की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धि काजू से जुड़ा प्रस्ताव रहा। भारत दुनिया के प्रमुख काजू उत्पादक और निर्यातक देशों में शामिल है। अब पहली बार काजू की गुणवत्ता, सुरक्षा और व्यापार के लिए एक समान अंतरराष्ट्रीय कोडेक्स मानक विकसित किया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारतीय काजू उद्योग को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूत स्थिति मिलेगी और अलग-अलग देशों के अलग-अलग गुणवत्ता नियमों के कारण आने वाली चुनौतियां काफी हद तक कम होंगी।
काजू निर्यातकों के लिए यह फैसला विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अभी तक विभिन्न देशों के अलग-अलग गुणवत्ता मानकों के कारण निर्यातकों को कई तरह की तकनीकी और दस्तावेजी चुनौतियों का सामना करना पड़ता था। एक समान वैश्विक मानक बनने के बाद व्यापार प्रक्रिया अधिक पारदर्शी, सरल और प्रतिस्पर्धी होने की उम्मीद है।
भारत की सक्रिय भूमिका को देखते हुए आयोग ने देश को ‘न्यू फूड सोर्सेज एंड प्रोडक्शन सिस्टम्स’ से जुड़े इलेक्ट्रॉनिक वर्किंग ग्रुप का सह-अध्यक्ष भी चुना है। यह समूह भविष्य की खाद्य उत्पादन तकनीकों, नवाचारों और नए नियामकीय ढांचे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करेगा। इससे वैश्विक खाद्य नीति निर्धारण में भारत की भूमिका और प्रभाव दोनों मजबूत होंगे।
इस सत्र में भारत की सह-अध्यक्षता में तैयार पांच अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेजों को भी मंजूरी मिली। इनमें वनीला और बड़ी इलायची के लिए अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानक शामिल हैं। इसके अलावा खाद्य उत्पादन और प्रसंस्करण में पानी के सुरक्षित उपयोग और पुनः उपयोग से संबंधित दिशा-निर्देशों को भी स्वीकृति दी गई। खाद्य सुरक्षा के लिहाज से यह एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, क्योंकि जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन और सुरक्षित उपयोग पर वैश्विक स्तर पर लगातार जोर दिया जा रहा है।
इसके अतिरिक्त चिकन मीट में कैंपिलोबैक्टर और साल्मोनेला जैसे बैक्टीरिया के नियंत्रण के लिए तैयार अंतरराष्ट्रीय दिशानिर्देशों को भी मंजूरी दी गई। इन मानकों का उद्देश्य खाद्य जनित संक्रमणों को कम करना और उपभोक्ताओं को अधिक सुरक्षित खाद्य उत्पाद उपलब्ध कराना है।
भारत की यह सफलता केवल कृषि या खाद्य निर्यात तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक खाद्य नीति निर्माण में देश की बढ़ती भूमिका का भी प्रमाण है। भारतीय कृषि उत्पादों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को अंतरराष्ट्रीय मंच पर नई पहचान मिलने से किसानों, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग और निर्यात क्षेत्र को दीर्घकालिक लाभ मिल सकता है।भारत लंबे समय से मसालों, काजू, चाय, कॉफी और अन्य कृषि उत्पादों का प्रमुख निर्यातक रहा है।
अंतरराष्ट्रीय मानकों के निर्माण में सक्रिय भागीदारी से भारतीय उत्पादों को नए बाजारों तक पहुंचने का अवसर मिलेगा और निर्यात में आने वाली गैर-शुल्क बाधाओं को कम करने में भी मदद मिलेगी।