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अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump का दावा: चीन ने 22 करोड़ अमेरिकी मतदाताओं का डेटा चुराया

अमेरिका की राजनीति में एक बार फिर चुनावी सुरक्षा और विदेशी हस्तक्षेप का मुद्दा सुर्खियों में है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने दावा किया है कि चीन ने करीब 22 करोड़ (220 मिलियन) अमेरिकी मतदाताओं का डेटा हासिल कर लिया था। उनके अनुसार, इस डेटा में मतदाताओं से जुड़ी कई तरह की व्यक्तिगत जानकारियां शामिल […]

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  • July 17, 2026 10:26 am IST, Published 1 hour ago

अमेरिका की राजनीति में एक बार फिर चुनावी सुरक्षा और विदेशी हस्तक्षेप का मुद्दा सुर्खियों में है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने दावा किया है कि चीन ने करीब 22 करोड़ (220 मिलियन) अमेरिकी मतदाताओं का डेटा हासिल कर लिया था। उनके अनुसार, इस डेटा में मतदाताओं से जुड़ी कई तरह की व्यक्तिगत जानकारियां शामिल थीं, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा और चुनावी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

ट्रंप ने कहा कि इस तरह की घटना केवल डेटा सुरक्षा का मामला नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए भी चुनौती हो सकती है। उनका कहना है कि यदि किसी विदेशी देश के पास इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं की जानकारी पहुंच जाती है, तो उसका दुरुपयोग विभिन्न तरीकों से किया जा सकता है।

हालांकि, इस दावे को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। चीन ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा है कि उसने कभी भी अमेरिकी चुनावों में हस्तक्षेप नहीं किया और ऐसे दावे निराधार हैं।

वहीं, पहले जारी अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की सार्वजनिक रिपोर्टों में यह कहा गया था कि 2020 के चुनाव के दौरान ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि किसी विदेशी सरकार ने वोटिंग सिस्टम, मतगणना या आधिकारिक चुनाव परिणामों में तकनीकी रूप से हस्तक्षेप किया था। हालांकि, हाल में सामने आए दावों और दस्तावेजों को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।

मतदाता डेटा कई स्रोतों से उपलब्ध हो सकता है। अमेरिका के कई राज्यों में मतदाता पंजीकरण से जुड़ी कुछ जानकारी सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा भी होती है। इसलिए केवल डेटा उपलब्ध होना और चुनावी प्रक्रिया में वास्तविक हस्तक्षेप होना, दोनों अलग-अलग मुद्दे हैं। किसी भी दावे की पुष्टि स्वतंत्र जांच और आधिकारिक साक्ष्यों के आधार पर ही की जा सकती है। इस पूरे घटनाक्रम ने अमेरिका में साइबर सुरक्षा, डेटा संरक्षण और चुनावी पारदर्शिता को लेकर नई बहस शुरू कर दी है।

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