शिमला: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने मातृत्व अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि सरोगेसी के माध्यम से मां बनने वाली महिला सरकारी कर्मचारी भी 180 दिनों के मातृत्व अवकाश की हकदार होगी। अदालत ने कहा कि मातृत्व को केवल जैविक जन्म देने की प्रक्रिया तक सीमित नहीं किया जा सकता और सरोगेसी के जरिए मां बनने वाली महिला को भी वही अधिकार मिलने चाहिए जो किसी अन्य मां को प्राप्त होते हैं।
न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि मातृत्व का संबंध केवल बच्चे को जन्म देने से नहीं, बल्कि उसके पालन-पोषण, देखभाल और भावनात्मक विकास से भी है। इसलिए सरोगेसी से मां बनने वाली महिला और प्राकृतिक रूप से बच्चे को जन्म देने वाली महिला के बीच किसी प्रकार का भेदभाव करना संविधान की भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
यह मामला एक महिला सरकारी कर्मचारी से जुड़ा था, जिसने सरोगेसी के माध्यम से मातृत्व प्राप्त किया था। संबंधित विभाग ने उसे सामान्य मातृत्व अवकाश का लाभ देने से इनकार कर दिया था। इसके बाद महिला ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने मातृत्व अधिकारों और बच्चे के हितों को केंद्र में रखते हुए विस्तृत विचार किया।
न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल की अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और गरिमा का अधिकार शामिल है। इसी अधिकार के दायरे में मातृत्व और बच्चे के समुचित विकास का अधिकार भी आता है। अदालत ने माना कि नवजात बच्चे को मां की देखभाल और भावनात्मक सहयोग की आवश्यकता होती है, चाहे उसका जन्म किसी भी माध्यम से हुआ हो।
फैसले में कहा गया कि मातृत्व अवकाश का मूल उद्देश्य केवल प्रसव के बाद स्वास्थ्य लाभ देना नहीं है, बल्कि मां और बच्चे के बीच मजबूत भावनात्मक संबंध स्थापित करने के लिए पर्याप्त समय उपलब्ध कराना भी है। ऐसे में सरोगेसी के मामलों में मातृत्व अवकाश से इनकार करना इस उद्देश्य के विपरीत होगा।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि सरोगेसी के माध्यम से मां बनने वाली महिला और प्राकृतिक रूप से बच्चे को जन्म देने वाली महिला के बीच अंतर करना नारी सम्मान और मातृत्व की अवधारणा के खिलाफ है। न्यायालय के अनुसार, मां की पहचान उसके मातृत्व से होती है, न कि केवल जन्म देने की प्रक्रिया से।
हाईकोर्ट ने मामले से जुड़े विभागीय आदेशों और पत्रों को निरस्त करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता द्वारा दोनों बच्चों के जन्म के समय ली गई 180-180 दिनों की छुट्टी को मातृत्व अवकाश के रूप में दर्ज किया जाए। इसके साथ ही अदालत ने जुलाई-अगस्त 2021 तथा सितंबर 2021 से संबंधित बकाया वेतन का भुगतान निर्धारित समय सीमा के भीतर करने का आदेश भी दिया।
यह फैसला भविष्य में सरोगेसी के माध्यम से मातृत्व प्राप्त करने वाली महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनेगा। इससे सरकारी और अन्य संस्थानों में कार्यरत महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति अधिक स्पष्टता मिलेगी और समानता के सिद्धांत को मजबूती मिलेगी। महिला अधिकारों से जुड़े संगठनों ने भी इस निर्णय का स्वागत किया है।
आधुनिक चिकित्सा तकनीकों के बढ़ते उपयोग के साथ सरोगेसी के मामले बढ़ रहे हैं। ऐसे में मातृत्व अवकाश, कर्मचारी अधिकारों और बाल कल्याण से जुड़े नियमों को भी समयानुकूल बनाना जरूरी है। हाईकोर्ट का यह निर्णय न केवल मातृत्व अधिकारों को मजबूत करता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि किसी महिला के साथ मातृत्व प्राप्त करने के तरीके के आधार पर भेदभाव न किया जाए।