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नेपाल में ग्लेशियर झील फटने से उत्तराखंड की संवेदनशील झीलों पर बढ़ा खतरा

देहरादूनः नेपाल में ग्लेशियर झील फटने की घटना ने हिमालयी क्षेत्रों में आपदा के खतरे को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है। पड़ोसी देश में हुई इस घटना के बाद उत्तराखंड की उन ग्लेशियर झीलों पर भी नजरें टिक गई हैं, जिन्हें संभावित रूप से संवेदनशील और खतरनाक माना गया है। हिमालयी क्षेत्र […]

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  • August 30, 2026 5:04 pm IST, Published 2 hours ago

देहरादूनः नेपाल में ग्लेशियर झील फटने की घटना ने हिमालयी क्षेत्रों में आपदा के खतरे को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है। पड़ोसी देश में हुई इस घटना के बाद उत्तराखंड की उन ग्लेशियर झीलों पर भी नजरें टिक गई हैं, जिन्हें संभावित रूप से संवेदनशील और खतरनाक माना गया है। हिमालयी क्षेत्र में लगातार बदलते मौसम, बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों के पिघलने की घटनाओं के बीच ग्लेशियर झीलों का बढ़ता आकार विशेषज्ञों और आपदा प्रबंधन एजेंसियों के लिए गंभीर चुनौती बन रहा है।
उत्तराखंड में करीब 426 ग्लेशियर झीलें मौजूद होने की जानकारी सामने आई है। इनमें से राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण यानी NDMA ने 13 ग्लेशियर झीलों को खतरनाक श्रेणी में रखा है। इन झीलों में अचानक पानी का स्तर बढ़ने या झील की प्राकृतिक संरचना टूटने की स्थिति में नीचे की ओर बसे इलाकों में बाढ़ जैसी आपदा पैदा हो सकती है।

ग्लेशियर झील के फटने की घटना को वैज्ञानिक भाषा में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है। ऐसी स्थिति तब बन सकती है जब ग्लेशियर के पीछे या उसके आसपास जमा पानी अचानक किसी प्राकृतिक बांध के टूटने के कारण तेजी से नीचे की ओर बहने लगे। पानी की यह तेज धारा अपने रास्ते में आने वाले पुलों, सड़कों, भवनों और अन्य बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा सकती है।

उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए इस खतरे को और गंभीर माना जा रहा है। राज्य का बड़ा हिस्सा हिमालयी क्षेत्र में आता है और यहां कई नदियों का उद्गम ग्लेशियरों तथा ऊंचाई वाले इलाकों में मौजूद जल स्रोतों से होता है। ऐसे में ऊंचाई वाले क्षेत्रों में होने वाली किसी बड़ी घटना का असर निचले इलाकों तक पहुंच सकता है।

संवेदनशील झीलों की निगरानी और संभावित खतरे को कम करने के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की तैयारी की जा रही है। इस व्यवस्था का उद्देश्य झीलों में पानी के स्तर, तापमान और अन्य महत्वपूर्ण बदलावों की निगरानी करना तथा खतरे की स्थिति में समय रहते संबंधित एजेंसियों और प्रभावित आबादी को चेतावनी देना है।

जानकारी के मुताबिक अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित करने के लिए केंद्र सरकार की ओर से 30 करोड़ रुपये की मंजूरी दी गई है। इसमें से करीब 8.10 करोड़ रुपये की राशि अब तक जारी की जा चुकी है। इस पहल के जरिए संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने और आपदा की स्थिति में प्रतिक्रिया समय कम करने पर जोर दिया जा रहा है।

जिन झीलों को संवेदनशील माना गया है, उनमें वसुंधरा ताल और माबांग समेत कई अन्य झीलें शामिल हैं। इसके अलावा स्यूंतियांक्ति और प्युंगरु जैसी झीलों को लेकर भी खतरे की निगरानी की जा रही है। इन क्षेत्रों में किसी भी असामान्य बदलाव को समय रहते पहचानना आपदा प्रबंधन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होगा।

विशेषज्ञों के अनुसार ग्लेशियर झीलों के खतरे से निपटने के लिए केवल चेतावनी प्रणाली लगाना ही पर्याप्त नहीं है। नियमित वैज्ञानिक सर्वेक्षण, सैटेलाइट निगरानी, जमीनी स्तर पर निरीक्षण, जल प्रवाह का अध्ययन और संवेदनशील इलाकों में रहने वाली आबादी को जागरूक करना भी जरूरी है। इसके साथ ही संभावित बाढ़ मार्गों की पहचान और आपदा की स्थिति में सुरक्षित निकासी की योजना तैयार रखना महत्वपूर्ण है।

नेपाल की हालिया घटना ने हिमालयी राज्यों के लिए यह संदेश जरूर दिया है कि ग्लेशियर झीलों से जुड़े खतरे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उत्तराखंड में मौजूद सैकड़ों ग्लेशियर झीलों में से संवेदनशील झीलों की लगातार निगरानी और आधुनिक तकनीक आधारित चेतावनी तंत्र भविष्य में बड़े नुकसान को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

 

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