नई दिल्ली: देश के कपास उत्पादक इलाकों में इस साल बारिश का असमान वितरण फसल की संभावनाओं पर असर डाल रहा है। कमजोर मानसून के चलते 2026-27 सीजन में भारत का कपास उत्पादन पहले के अनुमान की तुलना में कम रहने की संभावना है। अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) की फॉरेन एग्रीकल्चरल सर्विस (FAS) ने देश के कपास उत्पादन का अनुमान घटाकर करीब 2.45 करोड़ गांठ कर दिया है। यह मात्रा लगभग 53.3 लाख टन के बराबर है।
इससे पहले उत्पादन का अनुमान करीब 2.52 करोड़ गांठ लगाया गया था। नए अनुमान में लगभग 7 लाख गांठ की कमी की गई है। कपास की खेती का कुल रकबा करीब 1.15 करोड़ हेक्टेयर बताया गया है। विशेषज्ञों के मुताबिक पश्चिमी और मध्य भारत में अगस्त-सितंबर के दौरान बारिश की कमी और सूखे जैसी स्थिति रहने पर फसल की उत्पादकता प्रभावित हो सकती है। प्रति हेक्टेयर उपज में करीब 2 फीसदी गिरावट का अनुमान भी लगाया गया है।
खपत उत्पादन से अधिक रहने का अनुमान
कपास बाजार के लिए चिंता का एक बड़ा कारण घरेलू खपत और उत्पादन के बीच बढ़ता अंतर है। देश की कपड़ा मिलों की कुल कपास खपत 2026-27 सीजन में करीब 2.62 करोड़ गांठ, यानी लगभग 57 लाख टन रहने का अनुमान है। इस लिहाज से घरेलू मांग और अनुमानित उत्पादन के बीच करीब 17 लाख गांठ का अंतर बन सकता है।
उत्पादन कम और मांग अपेक्षाकृत अधिक रहने की स्थिति में कपास की उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है। इसका असर मंडियों से लेकर वायदा बाजार तक देखने को मिल सकता है। बाजार में आपूर्ति तंग रहने पर कपास की कीमतों को मजबूती मिलने की संभावना है।
इसके अलावा कपास के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में बढ़ोतरी भी बाजार भाव को समर्थन देने वाला कारक हो सकती है। किसानों को बेहतर कीमत मिलने की उम्मीद से कपास की बिक्री और स्टॉकिंग के रुझान में भी बदलाव आ सकता है।
बिनौला पर भी पड़ेगा असर
कपास उत्पादन में संभावित कमी का प्रभाव केवल कपड़ा उद्योग तक सीमित नहीं रहेगा। कपास की ओटाई के दौरान निकलने वाले लिंट के साथ बिनौले की उपलब्धता भी प्रभावित होती है। बिनौला और उससे तैयार होने वाली खल पशु आहार उद्योग के लिए महत्वपूर्ण कच्चा माल है।
भारत बिनौला मील और खल के प्रमुख उत्पादकों में शामिल है।
इसका इस्तेमाल मवेशियों के चारे में प्रोटीन के स्रोत के रूप में किया जाता है। यदि कपास की फसल कम होती है तो बिनौले की उपलब्धता भी घट सकती है। इससे बिनौला खल की कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका है। बिनौला खल महंगा होने की स्थिति में डेयरी और पशुपालन क्षेत्र की लागत बढ़ सकती है। इसका अप्रत्यक्ष असर दूध उत्पादन की लागत और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ने की संभावना है।
खरीफ फसलों की बुआई भी प्रभावित
मानसून की अनियमितता का असर केवल कपास तक सीमित नहीं है। खरीफ सीजन में कई प्रमुख फसलों की बुआई का रकबा पिछले साल की तुलना में घटा है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक कुल फसली क्षेत्र में करीब 18 फीसदी की कमी दर्ज की गई है। धान की बुआई में भी गिरावट सामने आई है। पिछले साल करीब 428.46 लाख हेक्टेयर में धान की खेती हुई थी, जबकि इस साल यह क्षेत्र घटकर करीब 414.10 लाख हेक्टेयर रह गया। दूसरी ओर दलहन के रकबे में मामूली बढ़ोतरी हुई है। अरहर की बुआई करीब 44.59 लाख हेक्टेयर तक पहुंची है।
कपास बाजार में आने वाले महीनों में मौसम की स्थिति अहम भूमिका निभाएगी। यदि पश्चिमी और मध्य भारत में बारिश की स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो उत्पादन और बिनौले की उपलब्धता पर दबाव और बढ़ सकता है। ऐसे में घरेलू मांग को पूरा करने के लिए बाजार में कपास की आपूर्ति प्रबंधन महत्वपूर्ण होगा। उत्पादन में कमी, ऊंची घरेलू खपत और MSP से मिलने वाला समर्थन कपास की कीमतों को आगे भी मजबूत बनाए रखने वाले प्रमुख कारक हो सकते हैं।