मुंबई: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को राष्ट्र के भविष्य से जोड़ते हुए कहा कि किसी भी देश की वास्तविक ताकत केवल उसकी आर्थिक या सैन्य क्षमता से तय नहीं होती, बल्कि उसकी स्मृति, इतिहास, भाषा, संस्कार, अभिलेख और परंपराओं को सुरक्षित रखने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि जो समाज अपनी सांस्कृतिक जड़ों को संभालकर रखता है, उसे लंबे समय तक दबाया या उसकी पहचान को समाप्त नहीं किया जा सकता।
मुंबई स्थित एशियाटिक सोसाइटी में ‘श्री गणेश ध्यानारती’ पांडुलिपियों की विशेष प्रदर्शनी के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कहा कि ऐतिहासिक दस्तावेज और पांडुलिपियां केवल पुराने समय की वस्तुएं नहीं हैं, बल्कि वे किसी सभ्यता की सामूहिक स्मृति का हिस्सा होती हैं। इनके माध्यम से आने वाली पीढ़ियों को अपने इतिहास, ज्ञान और सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़ने का अवसर मिलता है।
गृह मंत्री ने कहा कि दुनिया के इतिहास में ऐसे कई दौर आए, जब भारत की ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को नुकसान पहुंचाने के प्रयास किए गए। इसके बावजूद भारतीय समाज ने अपनी स्मृति और ज्ञान की परंपरा को जीवित रखा। उन्होंने भारत को इसका उदाहरण बताते हुए कहा कि देश लंबे समय तक विदेशी शासन के अधीन रहा, लेकिन उसकी सांस्कृतिक चेतना और ज्ञान परंपरा समाप्त नहीं हुई।
अमित शाह ने प्राचीन भारत की शिक्षा और ज्ञान परंपरा का उल्लेख करते हुए नालंदा का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि किसी पुस्तकालय या भवन को नष्ट किया जा सकता है, लेकिन वहां संचित ज्ञान अगर समाज की सामूहिक चेतना का हिस्सा बन चुका हो तो उसे पूरी तरह समाप्त करना संभव नहीं है। उनके मुताबिक, भारत की सभ्यता में ज्ञान केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों की स्मृति और संस्कारों के माध्यम से आगे बढ़ता रहा।
एशियाटिक सोसाइटी ऑफ मुंबई में गणेश ज्ञानार्थी प्रदर्शनी के उद्घाटन समारोह से लाइव…
एशियाटिक सोसायटी ऑफ मुंबई येथील ‘गणेश ज्ञानार्थी’ प्रदर्शनाच्या उद्घाटन समारंभातून थेट प्रक्षेपण… https://t.co/jw0NhRb0XP
— Amit Shah (@AmitShah) September 13, 2026
उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन परंपराओं में भाषा, व्याकरण, साहित्य, दर्शन और ज्ञान की विभिन्न धाराओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इन परंपराओं को संरक्षित करना केवल अतीत को याद करना नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ना भी है। पांडुलिपियों और अभिलेखों का संरक्षण इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
एशियाटिक सोसाइटी में आयोजित प्रदर्शनी के संदर्भ में गृह मंत्री ने भारतीय पांडुलिपि परंपरा के महत्व को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि ऐसी सामग्री में देश की सांस्कृतिक यात्रा, धार्मिक परंपराओं और ज्ञान की विविध धाराओं के कई महत्वपूर्ण पहलू सुरक्षित हैं। इसलिए इनका संरक्षण, अध्ययन और नई पीढ़ी तक इनकी जानकारी पहुंचाना जरूरी है।
शाह के संबोधन में सांस्कृतिक विरासत के साथ राष्ट्रीय पहचान का विषय भी प्रमुख रहा। उन्होंने कहा कि किसी राष्ट्र की पहचान उसकी ऐतिहासिक स्मृति से गहराई से जुड़ी होती है। यदि समाज अपनी भाषा, परंपराओं, अभिलेखों और संस्कारों से दूर हो जाए तो उसकी सांस्कृतिक निरंतरता कमजोर पड़ सकती है। इसके विपरीत अपनी विरासत को सुरक्षित रखने वाला समाज कठिन परिस्थितियों में भी अपनी पहचान कायम रख सकता है।
गृह मंत्री ने भारतीय सभ्यता की दीर्घकालिक निरंतरता को रेखांकित करते हुए कहा कि देश की ज्ञान परंपरा ने अनेक चुनौतियों के बावजूद अपना अस्तित्व बनाए रखा है। उनके अनुसार, भारत की सांस्कृतिक शक्ति का आधार उसकी वह सामूहिक स्मृति है, जिसमें पीढ़ियों से ज्ञान, परंपराएं और संस्कार संचित होते रहे हैं।
‘श्री गणेश ध्यानारती’ पांडुलिपियों की प्रदर्शनी इसी व्यापक विरासत का एक उदाहरण है। ऐसे प्रयासों के जरिए दुर्लभ ऐतिहासिक सामग्री को लोगों के सामने लाने के साथ उसके महत्व को समझने का अवसर भी मिलता है। अमित शाह ने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया कि विरासत का संरक्षण केवल संस्थानों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी महत्वपूर्ण दायित्व है।