नई दिल्ली: 1993 के मुंबई सीरियल ब्लास्ट मामले में दोषी ठहराए गए गैंगस्टर अबू सलेम को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सर्वोच्च अदालत ने उसकी समय से पहले रिहाई की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। इसके साथ ही बॉम्बे हाई कोर्ट का वह फैसला भी बरकरार रहा, जिसमें सलेम की रिहाई की मांग को स्वीकार नहीं किया गया था। इस फैसले के बाद अबू सलेम की तत्काल जेल से बाहर आने की उम्मीद खत्म हो गई है।
अबू सलेम फिलहाल महाराष्ट्र की नासिक सेंट्रल जेल में बंद है। उसने अपनी याचिका में दावा किया था कि पुर्तगाल से भारत प्रत्यर्पण के दौरान दिए गए आश्वासन के अनुसार उसकी अधिकतम सजा 25 साल होनी चाहिए। सलेम की ओर से अदालत में यह तर्क दिया गया कि उसने 25 साल की अवधि पूरी कर ली है और सजा में मिली छूट यानी रिमिशन को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए। इसी आधार पर उसने समय से पहले रिहाई की मांग की थी।
मामले की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 27 जुलाई को अपना फैसला सुरक्षित रखा था। अब अदालत ने याचिका खारिज करते हुए सलेम की रिहाई की मांग को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इससे पहले बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी उसकी याचिका को समय से पहले दायर माना था। हाई कोर्ट के मुताबिक 25 साल की अवधि पूरी होने का समय 2030 में आएगा। सलेम ने इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
इस मामले की सबसे अहम कड़ी भारत और पुर्तगाल के बीच हुआ प्रत्यर्पण समझौता है। भारत सरकार ने अबू सलेम को पुर्तगाल से भारत लाने के दौरान वहां की सरकार को यह आश्वासन दिया था कि उसे 25 साल से ज्यादा समय तक जेल में नहीं रखा जाएगा और उसे मृत्युदंड भी नहीं दिया जाएगा। सलेम के वकीलों ने इसी आश्वासन को आधार बनाते हुए अदालत में कहा कि भारत में उसकी हिरासत की अवधि को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
अबू सलेम की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि वह वर्ष 2005 से भारतीय हिरासत में है। इसलिए उसके वकीलों का कहना था कि हिरासत की पूरी अवधि को गणना में शामिल किया जाना चाहिए। इसके अलावा सजा में मिलने वाली छूट को जोड़ने पर भी उसकी निर्धारित अवधि पूरी होने का दावा किया गया। हालांकि अदालत ने इस दलील के आधार पर तत्काल रिहाई का रास्ता नहीं खोला।
अबू सलेम को 1993 के मुंबई बम धमाकों के मामले में दोषी ठहराया जा चुका है। मुंबई में हुए इन सिलसिलेवार धमाकों ने देश को हिला दिया था और इस मामले की जांच तथा सुनवाई लंबे समय तक चली। सलेम को पुर्तगाल से प्रत्यर्पित किए जाने के बाद भारत में उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ी। प्रत्यर्पण की प्रक्रिया के दौरान भारत की ओर से दिए गए आश्वासनों के कारण उसकी सजा को लेकर कानूनी स्थिति लंबे समय से चर्चा में रही है।
अदालत के फैसले के बाद यह भी स्पष्ट हो गया है कि केवल रिमिशन या हिरासत की अवधि का दावा करने से अबू सलेम को तत्काल रिहाई नहीं मिल सकती। बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उसकी मौजूदा स्थिति में बदलाव नहीं किया है। ऐसे में 2030 से जुड़ी अवधि का मुद्दा भी इस मामले में महत्वपूर्ण बना हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि इसमें एक तरफ दोषी की रिहाई से जुड़ी दलीलों पर विचार हुआ, तो दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय प्रत्यर्पण के दौरान दिए गए आश्वासनों की कानूनी स्थिति भी चर्चा में रही। फिलहाल अबू सलेम नासिक सेंट्रल जेल में ही रहेगा और उसकी समय से पहले रिहाई की मौजूदा कोशिश सफल नहीं हो पाई है।