वाराणसी की दो बालिग महिलाओं के समलैंगिक लिव-इन संबंध से जुड़े मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सुरक्षा को लेकर अहम टिप्पणी की है। दोनों महिलाओं ने अदालत का रुख करते हुए आशंका जताई थी कि उनके परिवार और रिश्तेदार उनके संबंध में हस्तक्षेप कर सकते हैं तथा उनकी सुरक्षा के लिए खतरा पैदा हो सकता है। याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने बालिग व्यक्तियों की पसंद, स्वायत्तता और जीवन के अधिकार से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों पर विचार किया।
मामला दो ऐसी युवतियों से संबंधित है, जो अलग-अलग धर्मों से ताल्लुक रखती हैं और अपनी इच्छा से एक साथ रह रही हैं। याचिका में कहा गया कि दोनों बालिग, अविवाहित और शिक्षित हैं तथा उन्होंने बिना किसी दबाव के साथ रहने का निर्णय लिया है। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि उनके रिश्ते से परिवार के कुछ लोग नाराज हैं और इसी वजह से उन्हें सुरक्षा को लेकर चिंता है। उन्होंने अदालत से मांग की थी कि पुलिस को उनकी जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित करने और उनके शांतिपूर्ण सहजीवन में किसी तरह की बाधा रोकने का निर्देश दिया जाए।
सुनवाई के दौरान दोनों याचिकाकर्ताएं अदालत के समक्ष व्यक्तिगत रूप से पेश हुईं। उन्होंने अपने बयान दर्ज कराते हुए स्पष्ट किया कि वे बालिग हैं और अपने फैसलों को समझने में सक्षम हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वे अपनी इच्छा से साथ रह रही हैं और आगे भी इसी तरह जीवन बिताना चाहती हैं। अदालत ने उनके बयानों को न्यायिक रिकॉर्ड का हिस्सा बनाया।याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकीलों ने संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का हवाला देते हुए कहा कि प्रत्येक बालिग व्यक्ति को समानता, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के नवतेज सिंह जौहर मामले का भी संदर्भ दिया, जिसमें यौन अभिरुचि, निजता और गरिमा से जुड़े संवैधानिक अधिकारों पर महत्वपूर्ण व्याख्या की गई थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से यह तर्क रखा गया कि किसी व्यक्ति की निजी पसंद और उसकी पहचान के आधार पर उसकी सुरक्षा को खतरे में नहीं डाला जा सकता।
अदालत के समक्ष राज्य सरकार की ओर से याचिका का विरोध भी किया गया। सरकारी पक्ष ने दलील दी कि समलैंगिक संबंधों को लेकर भारतीय समाज के एक हिस्से में पारंपरिक दृष्टिकोण मौजूद है और विवाह तथा परिवार की व्यवस्था को लेकर सामाजिक मान्यताएं अलग हैं। राज्य की ओर से यह भी तर्क रखा गया कि अपनी पसंद का साथी चुनना व्यक्तिगत स्वतंत्रता के दायरे में आता है, लेकिन इससे किसी विशेष प्रकार के संबंध को कानूनी मान्यता देने का स्वतः अधिकार नहीं बनता।
अदालत ने मामले में बालिग व्यक्तियों की स्वतंत्रता और सुरक्षा के पहलू को महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने कहा कि दो वयस्क व्यक्तियों को अपनी पसंद से साथी चुनने और सहमति से साथ रहने के अधिकार को केवल सामाजिक असहमति या पारिवारिक विरोध के आधार पर खतरे में नहीं डाला जा सकता। अदालत ने संबंधित पुलिस अधिकारियों को दोनों महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए।
हाईकोर्ट की टिप्पणी में यह भी स्पष्ट किया गया कि लिव-इन संबंध अपने आप में अपराध नहीं है। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड में अदालत ने पहले भी कहा है कि यदि दो बालिग व्यक्ति सहमति से साथ रह रहे हैं और किसी अपराध में शामिल नहीं हैं, तो केवल उनके साथ रहने के आधार पर उन्हें सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता।
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब अदालतें व्यक्तिगत स्वतंत्रता, साथी चुनने के अधिकार और सामाजिक या पारिवारिक दबाव के बीच संतुलन से जुड़े मामलों पर लगातार विचार कर रही हैं। हालांकि, किसी रिश्ते को सामाजिक या कानूनी मान्यता देने का प्रश्न और किसी बालिग व्यक्ति की जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा का प्रश्न अलग-अलग कानूनी पहलू हैं। इस मामले में हाईकोर्ट के समक्ष मुख्य मुद्दा याचिकाकर्ताओं की सुरक्षा और उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा था।
अदालत के निर्देश के बाद संबंधित पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि दोनों महिलाओं की सुरक्षा संबंधी शिकायतों पर आवश्यक कार्रवाई करें। मामले में आगे की स्थिति पुलिस की कार्रवाई और अदालत के आदेश के अनुपालन पर निर्भर करेगी।