अखिलेश के फैसले पर राजभर का तंज, सपा पर सहयोगियों का हमला

राज्यसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की विधानसभा संख्या के कारण राजनीतिक दलों के लिए एक-एक विधायक का समर्थन अहम हो जाता है। ऐसे में छोटे दलों और सहयोगी पार्टियों की भूमिका अचानक बढ़ जाती है। यही वजह है कि आरएलडी के नौ विधायक और अन्य दलों के संभावित समर्थन को लेकर सियासी चर्चाएं तेज हैं।

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  • October 6, 2026 4:15 pm IST, Published 1 hour ago

उत्तर प्रदेश में राज्यसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी की ओर से तीसरा उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारे जाने के बाद सियासी दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। खासतौर पर सत्तारूढ़ गठबंधन से जुड़े नेताओं ने इस फैसले को लेकर सपा और उसके नेतृत्व पर निशाना साधना शुरू कर दिया है। वहीं, राष्ट्रीय लोकदल ने अपने विधायकों की संख्या का उल्लेख करते हुए चुनावी समीकरणों में अपनी अहमियत का संकेत दिया है।

सपा के तीसरे प्रत्याशी को लेकर कई दिनों से राजनीतिक अटकलें चल रही थीं। पार्टी के पास अपने समर्थक विधायकों के जरिए अतिरिक्त मुकाबला खड़ा करने की संभावनाओं को लेकर चर्चा थी। हालांकि, अंततः पार्टी ने तीसरा उम्मीदवार नहीं उतारने का फैसला किया। इसके बाद विपक्षी खेमे ने इसे सपा की रणनीतिक कमजोरी के तौर पर पेश करना शुरू कर दिया।

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव पर तंज कसते हुए कहा कि चुनावी राजनीति में केवल दावे करने से काम नहीं चलता, बल्कि संख्या और समर्थन भी जरूरी होता है। राजभर के बयान को सपा की रणनीति पर सीधा राजनीतिक हमला माना जा रहा है। उनका संकेत इस ओर रहा कि मौजूदा विधानसभा संख्या के बीच राज्यसभा चुनाव में हर विधायक की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

दूसरी ओर, राष्ट्रीय लोकदल ने भी अपने नौ विधायकों की ताकत को सामने रखते हुए सपा को राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है। आरएलडी का कहना है कि उसके विधायक किसी भी चुनावी गणित में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। पार्टी के इस रुख से साफ है कि वह राज्य की राजनीति में अपनी स्थिति को केवल संख्या तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि गठबंधन की राजनीति में अपने प्रभाव को भी रेखांकित करना चाहती है।

राज्यसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की विधानसभा संख्या के कारण राजनीतिक दलों के लिए एक-एक विधायक का समर्थन अहम हो जाता है। ऐसे में छोटे दलों और सहयोगी पार्टियों की भूमिका अचानक बढ़ जाती है। यही वजह है कि आरएलडी के नौ विधायक और अन्य दलों के संभावित समर्थन को लेकर सियासी चर्चाएं तेज हैं। सपा के तीसरे उम्मीदवार को मैदान में नहीं उतारने के फैसले को पार्टी की रणनीति के अलग-अलग नजरिए से देखा जा रहा है। एक ओर इसे अनावश्यक मुकाबले से बचने की रणनीति माना जा रहा है, तो दूसरी ओर विरोधी दल इसे सपा की सीमित राजनीतिक ताकत से जोड़कर देख रहे हैं। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर बयानबाजी और तेज होने की संभावना है।

फिलहाल राज्यसभा चुनाव ने उत्तर प्रदेश की गठबंधन राजनीति की तस्वीर को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। अखिलेश यादव के सामने जहां पार्टी के विधायकों और सहयोगी दलों के बीच तालमेल बनाए रखने की चुनौती है, वहीं आरएलडी और अन्य क्षेत्रीय दल अपनी राजनीतिक उपयोगिता जताने में जुटे हैं। चुनावी नतीजे भले बाद में सामने आएंगे, लेकिन उससे पहले ही इस पूरे घटनाक्रम ने प्रदेश की सियासत में नई बहस छेड़ दी है।

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