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एआई से बनी अश्लील तस्वीरों पर शिकंजे की तैयारी,सख्त नीति बनाने की तैयारी

शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया को अधिक व्यापक बनाने पर भी विचार किया जा रहा है। प्रस्ताव के अनुसार, किसी आपत्तिजनक सामग्री से प्रभावित व्यक्ति के अलावा कोई अन्य व्यक्ति भी सद्भावना के साथ शिकायत दर्ज करा सकेगा। इसका उद्देश्य ऐसे मामलों को सामने लाने में मदद करना है, जिनमें पीड़ित

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Supreme Court
Gauravshali Bharat News
  • October 28, 2026 10:28 am IST, Published 2 hours ago

सुप्रीम कोर्ट में बच्चों से जुड़े अश्लील कंटेंट के प्रसार पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर सख्त कदम उठाने के संकेत दिए हैं। केंद्र की ओर से अदालत को बताया गया कि बच्चों से संबंधित अश्लील सामग्री के प्रसार को रोकने के लिए एक व्यापक नीति ढांचा तैयार करने पर विचार किया जा रहा है। इस प्रस्ताव में केवल बच्चों से जुड़े आपत्तिजनक कंटेंट ही नहीं, बल्कि वयस्कों की सहमति के बिना उनकी अश्लील तस्वीरें और वीडियो साझा किए जाने जैसे मामलों को भी शामिल किया जा सकता है।

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार इस विषय को गंभीरता से ले रही है। उन्होंने अदालत को बताया कि डिजिटल माध्यमों पर आपत्तिजनक सामग्री के प्रसार से निपटने के लिए मौजूदा व्यवस्थाओं को और प्रभावी बनाने की जरूरत महसूस की जा रही है। इसी दिशा में एक ऐसे नीति ढांचे पर विचार हो रहा है, जिसके माध्यम से बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ इंटरनेट पर बिना सहमति के अश्लील सामग्री साझा किए जाने की घटनाओं पर भी अंकुश लगाया जा सके।

इस मामले में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल को भी एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने रखा गया। तुषार मेहता ने एआई की मदद से तैयार की जाने वाली तस्वीरों, मॉर्फ्ड इमेज और ऐसे डिजिटल कंटेंट को लेकर चिंता जताई, जिनमें किसी व्यक्ति का चेहरा या शरीर इस तरह इस्तेमाल किया जाता है कि वास्तविकता और कृत्रिम रूप से तैयार सामग्री के बीच अंतर करना मुश्किल हो सकता है। इस तरह की तस्वीरों और वीडियो का दुरुपयोग किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा, निजता और सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।

एआई तकनीक के विस्तार के साथ किसी व्यक्ति की तस्वीर में बदलाव करना या उसके चेहरे को दूसरी तस्वीर अथवा वीडियो में जोड़ना पहले की तुलना में आसान हो गया है। ऐसी सामग्री का इस्तेमाल लोगों को बदनाम करने, उन्हें परेशान करने या उनकी सहमति के बिना अश्लील कंटेंट तैयार करने के लिए किया जा सकता है। बच्चों से संबंधित मामलों में इस तरह की तकनीक का दुरुपयोग और भी गंभीर चिंता का विषय है। प्रस्तावित नीति ढांचे में इन नई चुनौतियों से निपटने के उपायों को शामिल करने पर विचार किया जा रहा है।

केंद्र सरकार ने यह भी संकेत दिया कि प्रस्तावित विधेयक के तहत इंटरनेट प्लेटफॉर्म और अन्य मध्यस्थ कंपनियों की जिम्मेदारियों को बढ़ाया जा सकता है। अभी आपत्तिजनक सामग्री सामने आने पर उसे हटाने की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण मानी जाती है, लेकिन नए प्रस्ताव में इसके अतिरिक्त कदम उठाने की व्यवस्था भी की जा सकती है। इसमें संबंधित अधिकारियों को ऐसे कंटेंट के अपलोड होने की जानकारी देना अनिवार्य बनाने का विकल्प शामिल हो सकता है। हालांकि, इन प्रावधानों का अंतिम स्वरूप विधायी प्रक्रिया और सरकार के फैसलों पर निर्भर करेगा।

शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया को अधिक व्यापक बनाने पर भी विचार किया जा रहा है। प्रस्ताव के अनुसार, किसी आपत्तिजनक सामग्री से प्रभावित व्यक्ति के अलावा कोई अन्य व्यक्ति भी सद्भावना के साथ शिकायत दर्ज करा सकेगा। इसका उद्देश्य ऐसे मामलों को सामने लाने में मदद करना है, जिनमें पीड़ित व्यक्ति सामाजिक दबाव, डर या अन्य कारणों से खुद शिकायत करने में असमर्थ हो सकता है। हालांकि, इस व्यवस्था को लागू करते समय शिकायतों की सत्यता की जांच और संभावित दुरुपयोग को रोकने जैसे पहलुओं पर भी ध्यान देना महत्वपूर्ण होगा।

सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान सामने आए इन बिंदुओं से स्पष्ट है कि ऑनलाइन अश्लील सामग्री के प्रसार को रोकने के लिए सरकार व्यापक समाधान तलाश रही है। इसमें बच्चों की सुरक्षा, वयस्कों की सहमति और निजता, एआई से तैयार की गई नकली तस्वीरों तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही जैसे विषय शामिल हैं। यदि प्रस्तावित नीति को विधायी रूप दिया जाता है, तो इंटरनेट पर आपत्तिजनक सामग्री की निगरानी, शिकायतों पर कार्रवाई और संबंधित अधिकारियों को सूचना देने की प्रक्रिया में बदलाव देखने को मिल सकता है। फिलहाल, सरकार की ओर से इस ढांचे पर विचार किए जाने की जानकारी दी गई है और इसके अंतिम प्रावधानों को लेकर आगे की प्रक्रिया महत्वपूर्ण रहेगी।

 

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