रैली में फारूक अब्दुल्ला ने देश में मुसलमानों को लेकर होने वाली बयानबाजी पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय के लोगों को बार-बार पाकिस्तानी कहकर निशाना बनाया जाता है। उन्होंने बीजेपी और आरएसएस के नेताओं को संबोधित करते हुए कहा कि मुसलमान भी इसी देश के नागरिक हैं और उनका भारत से गहरा रिश्ता है। उन्होंने याद दिलाया कि देश की आजादी और सुरक्षा के लिए पहले भी लोगों ने बलिदान दिया है और जरूरत पड़ने पर आगे भी देश के लिए कुर्बानी देने से पीछे नहीं हटेंगे। फारूक अब्दुल्ला ने लोगों से मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों से घबराने के बजाय मजबूती से खड़े रहने की अपील की। उन्होंने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि मौजूदा सत्ता हमेशा कायम नहीं रहेगी और एक दिन बदलाव जरूर आएगा।
ममता बनर्जी ने भी रैली के मंच से चुनावी प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि बंगाल में उनकी पार्टी की हार जनादेश की सामान्य प्रक्रिया का परिणाम नहीं, बल्कि उनके मुताबिक चुनाव में हुई कथित अनियमितताओं का नतीजा है। ममता ने आरोप लगाया कि चुनाव के दौरान ईवीएम और वोटों के साथ गड़बड़ी की गई तथा संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाया गया। उन्होंने चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर मतगणना की प्रक्रिया को प्रभावित करने का आरोप लगाया।
ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में एसआईआर यानी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर भी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया से बंगाल के लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ा है। मुख्यमंत्री ने साफ किया कि उनकी पार्टी राजनीतिक संघर्ष से पीछे हटने वाली नहीं है। उन्होंने कहा कि विपक्ष लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए अपनी लड़ाई जारी रखेगा। उनके संबोधन का मुख्य संदेश यही रहा कि चुनावी नतीजों को लेकर उठाए जा रहे सवालों पर जवाबदेही तय होनी चाहिए।
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी बीजेपी पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि राजनीतिक बदलाव किसी भी समय आ सकता है और उत्तर प्रदेश आने वाले समय में इस बदलाव की बड़ी वजह बनेगा। अखिलेश ने आरोप लगाया कि विपक्ष ने वोट चोरी से जुड़े मुद्दों को सामने रखा है, लेकिन चुनाव आयोग उनकी शिकायतों पर उचित ध्यान नहीं दे रहा है। उन्होंने दावा किया कि बीजेपी की राजनीतिक विदाई तय है और उत्तर प्रदेश में आने वाले चुनावों के दौरान इसका असर दिखाई देगा।
अखिलेश यादव ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के उस बयान पर भी पलटवार किया, जिसमें उत्तर प्रदेश को अंगद के पैर से जोड़कर राजनीतिक टिप्पणी की गई थी। अखिलेश ने इसी संदर्भ में तंज कसते हुए कहा कि जब जमीन ही नहीं बचेगी तो पैर टिकाने की जगह कहां मिलेगी। उनके इस बयान को बीजेपी के राजनीतिक प्रभाव और प्रदेश की सत्ता को लेकर विपक्ष की चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
सपा प्रमुख ने 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का जिक्र करते हुए कहा कि आने वाले चुनाव में बीजेपी को करारा राजनीतिक जवाब मिलेगा। उन्होंने रामलीला मैदान की रैली को लोकतंत्र की लड़ाई का अहम पड़ाव बताया। अखिलेश ने यह भी दावा किया कि उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची से एक करोड़ 27 लाख हिंदू मतदाताओं के नाम हटाए जाने की बात सामने आई है। उन्होंने इस मुद्दे को चुनावी पारदर्शिता से जोड़ते हुए सवाल उठाए।
तीनों नेताओं के भाषणों में अलग-अलग राज्यों के राजनीतिक मुद्दे जरूर प्रमुख रहे, लेकिन उनके बयानों में लोकतंत्र, संविधान, मतदाता अधिकार और चुनावी निष्पक्षता जैसे विषय साझा रूप से दिखाई दिए। रामलीला मैदान की इस सभा के जरिए इंडिया गठबंधन ने केंद्र सरकार के खिलाफ अपनी राजनीतिक एकजुटता दिखाने की कोशिश की। विपक्षी नेताओं ने स्पष्ट संकेत दिया कि वे चुनावी प्रक्रियाओं और सरकारी नीतियों को लेकर अपनी आवाज उठाते रहेंगे। अब इस रैली के बयानों का राजनीतिक असर आगामी चुनावों और विपक्ष की रणनीति में किस तरह दिखाई देता है, इस पर सभी की नजरें रहेंगी।