नई दिल्ली: वैवाहिक विवादों को लेकर दर्ज होने वाले आपराधिक मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता व्यक्त की है। अदालत ने कहा कि पति-पत्नी के बीच उत्पन्न मतभेदों को अनावश्यक रूप से आपराधिक मुकदमों में बदलने की प्रवृत्ति न्याय व्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने, दोनों के लिए नुकसानदायक है।
एक मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने पति और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ दर्ज कई आपराधिक मामलों को निरस्त कर दिया। अदालत ने पाया कि विभिन्न आरोपों के आधार पर बड़ी संख्या में मुकदमे दर्ज किए गए थे, जिनमें कई आरोप प्रथम दृष्टया ठोस आधार पर खरे नहीं उतरते थे।
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने वकीलों की भूमिका पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि अधिवक्ताओं का दायित्व केवल मुकदमा लड़ना नहीं, बल्कि अपने मुवक्किलों को उचित कानूनी सलाह देना भी है। उन्हें ऐसे कदमों को बढ़ावा देने से बचना चाहिए, जिनका उद्देश्य न्याय प्राप्त करना नहीं बल्कि दूसरे पक्ष को परेशान करना हो।
अदालत ने कहा कि पारिवारिक विवादों में भावनात्मक तनाव होना स्वाभाविक है, लेकिन हर मतभेद को गंभीर आपराधिक आरोपों का रूप देना उचित नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल प्रताड़ना के हथियार के रूप में नहीं होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक पूर्व फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि अधिवक्ताओं की समाज के प्रति महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। उन्हें यह सुनिश्चित करने का प्रयास करना चाहिए कि पारिवारिक विवाद अनावश्यक रूप से गंभीर कानूनी संघर्ष का रूप न लें। अदालत ने कहा कि घरेलू या वैवाहिक जीवन में उत्पन्न सामान्य मतभेदों और छोटी घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर आपराधिक मामलों में परिवर्तित करने की प्रवृत्ति से बचना आवश्यक है, क्योंकि इससे परिवार और समाज दोनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि केवल वास्तविक और प्रमाणिक मामलों को ही अदालतों तक लाया जाए। इससे न केवल न्यायिक संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा, बल्कि वास्तविक पीड़ितों को भी समय पर न्याय मिल सकेगा।