शिवसेना में टूट का असर, अब ऑफिस बचाने की चुनौती

नई दिल्ली: महाराष्ट्र की राजनीति में जारी उठापटक के बीच शिवसेना (UTB) और उसके प्रमुख उद्धव ठाकरे के सामने एक और चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है। पार्टी के कई सांसदों के दूसरे गुट में जाने के बाद अब संसद भवन परिसर में आवंटित कार्यालय को लेकर भी अनिश्चितता बढ़ गई है। राजनीतिक हलकों […]

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  • June 24, 2026 5:34 pm IST, Published 3 hours ago

नई दिल्ली: महाराष्ट्र की राजनीति में जारी उठापटक के बीच शिवसेना (UTB) और उसके प्रमुख उद्धव ठाकरे के सामने एक और चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है। पार्टी के कई सांसदों के दूसरे गुट में जाने के बाद अब संसद भवन परिसर में आवंटित कार्यालय को लेकर भी अनिश्चितता बढ़ गई है। राजनीतिक हलकों में इस घटनाक्रम को उद्धव ठाकरे के लिए एक और बड़ा झटका माना जा रहा है।

हाल ही में पार्टी के छह सांसदों के दूसरे गुट में शामिल होने के बाद शिवसेना (UTB) की लोकसभा में संख्या काफी घट गई है। यदि संबंधित प्रक्रिया को औपचारिक मंजूरी मिल जाती है तो पार्टी के सांसदों की संख्या घटकर चार रह जाएगी। संसदीय परंपराओं के अनुसार संसद भवन परिसर में अलग कार्यालय के आवंटन के लिए न्यूनतम सांसद संख्या महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे में पार्टी के मौजूदा कार्यालय पर सवाल खड़े होने लगे हैं।

वर्तमान में शिवसेना (यूबीटी) को संसद परिसर में एक कार्यालय आवंटित है, जहां से पार्टी अपने संसदीय कार्यों का संचालन करती है। लेकिन सांसदों की संख्या कम होने की स्थिति में इस सुविधा को बनाए रखना कठिन हो सकता है। अंतिम निर्णय संबंधित संसदीय प्रक्रिया और लोकसभा अध्यक्ष के स्तर पर लिया जाएगा।

सांसदों की इस टूट का असर केवल संसद में पार्टी की ताकत तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि संगठनात्मक और प्रतीकात्मक रूप से भी इसका प्रभाव दिखाई दे सकता है। संसद में कार्यालय किसी भी दल की उपस्थिति और सक्रियता का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।  महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना के भीतर विभाजन के बाद से दोनों गुट लगातार अपनी-अपनी ताकत बढ़ाने में जुटे हैं। एक ओर नेतृत्व और संगठन को लेकर दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सांसदों और जनप्रतिनिधियों के समर्थन को लेकर भी प्रतिस्पर्धा जारी है। हालिया घटनाक्रम ने इस राजनीतिक संघर्ष को और तेज कर दिया है।

पार्टी से अलग हुए सांसदों ने अपने कदम को वैचारिक और राजनीतिक कारणों से प्रेरित बताया है। दूसरी ओर, उद्धव ठाकरे खेमे ने इसे पार्टी को कमजोर करने की कोशिश करार दिया है। अब सभी की निगाहें लोकसभा अध्यक्ष के निर्णय पर टिकी हैं। यदि सांसदों के दल परिवर्तन को औपचारिक स्वीकृति मिलती है तो संसद में शिवसेना (UTB) की स्थिति और संसदीय सुविधाओं पर इसका सीधा असर पड़ सकता है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर होने वाले फैसले महाराष्ट्र की राजनीति के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बने रहेंगे।

 

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