मुंबई : सड़क दुर्घटनाओं में गंभीर रूप से घायल मरीजों को बचाना चिकित्सा जगत की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक माना जाता है, लेकिन कभी-कभी डॉक्टरों की प्रतिबद्धता, तकनीक और टीमवर्क मिलकर ऐसे चमत्कार कर दिखाते हैं जो उम्मीद से कहीं आगे होते हैं। नवी मुंबई के अपोलो हॉस्पिटल्स में एक 37 वर्षीय मर्चेंट नेवी अधिकारी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जिसने मौत को बेहद करीब से देखने के बाद फिर से जिंदगी की ओर कदम बढ़ाए हैं। कई फ्रैक्चर, कुचला हुआ हाथ, पल्स-लेस अंग और शरीर की मुख्य रक्त वाहिका एओर्टा के फट जाने जैसी जानलेवा चोटों के बावजूद डॉक्टरों ने न सिर्फ उसकी जान बचाई बल्कि उसे दोबारा खड़ा होने की उम्मीद भी दी।
मरीज के अस्पताल पहुंचते ही ट्रॉमा, ऑर्थोपेडिक, कार्डियोलॉजी, प्लास्टिक सर्जरी, क्रिटिकल केयर और फिजियोथेरेपी समेत कई विभागों के विशेषज्ञ एक साथ सक्रिय हो गए। 45 मिनट के भीतर ऑपरेशन शुरू कर दिया गया और घंटों चली जटिल सर्जरियों के जरिए उसकी स्थिति को स्थिर किया गया।
डॉ. समीर चौधरी कहते हैं, “यह हमारे द्वारा संभाले गए सबसे चुनौतीपूर्ण पॉलीट्रॉमा मामलों में से एक था। समय पर लिए गए फैसलों और विभिन्न विशेषज्ञों के समन्वय ने मरीज की जान बचाने में निर्णायक भूमिका निभाई।”
करीब एक सप्ताह तक वेंटिलेटर पर रहने और कई जटिल उपचार प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद मरीज की स्थिति में सुधार आने लगा। आईसीयू से वार्ड और फिर पुनर्वास की यात्रा ने उसकी जिंदगी को नई दिशा दी। आज वह खड़े होने और चलने की दिशा में लगातार प्रगति कर रहा है। अपोलो हॉस्पिटल्स, नवी मुंबई के सीओओ एवं यूनिट हेड डॉ. किरण शिंगोटे के अनुसार, “50 से अधिक डॉक्टरों, नर्सों और देखभालकर्ताओं के सामूहिक प्रयास ने एक जानलेवा ट्रॉमा को रिकवरी की प्रेरणादायक कहानी में बदल दिया।” यह घटना साबित करती है कि आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं, विशेषज्ञता और टीमवर्क मिलकर असंभव दिखने वाली परिस्थितियों में भी जीवन को नया अवसर दे सकते हैं।
(अनिल बेदाग)