नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने उच्च शिक्षा और सरकारी भर्ती से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि वर्ष 2022 से पहले एक साथ प्राप्त की गई दो शैक्षणिक डिग्रियों को केवल इस आधार पर अमान्य नहीं ठहराया जा सकता कि वे एक ही समय में हासिल की गई थीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि उस समय लागू नियमों के अनुसार डिग्रियां प्राप्त की गई थीं, तो उन्हें बाद में लागू हुए नियमों के आधार पर अवैध नहीं माना जा सकता।
यह फैसला उन हजारों विद्यार्थियों और अभ्यर्थियों के लिए राहत लेकर आया है जिन्होंने वर्ष 2022 से पहले समानांतर रूप से दो डिग्रियां पूरी की थीं। अदालत ने इस मामले में नेशनल एजुकेशन सोसाइटी फॉर ट्राइबल स्टूडेंट्स (NESTS) को चार चयनित पीजीटी अभ्यर्थियों की उम्मीदवारी पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया है।
क्या है पूरा मामला?
मामला एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूल (EMRS) भर्ती-2023 के तहत चयनित चार पोस्ट ग्रेजुएट टीचर (PGT) अभ्यर्थियों से जुड़ा है। इन अभ्यर्थियों ने वर्ष 2022 से पहले एमए और बीएड की पढ़ाई एक साथ पूरी की थी। चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद उन्हें नियुक्ति पत्र भी जारी कर दिए गए थे।
हालांकि, जून 2024 में एनईएसटीएस ने यह कहते हुए उनकी उम्मीदवारी रद्द कर दी कि दोनों डिग्रियां एक साथ प्राप्त की गई थीं और यह मान्य नहीं हैं। इसके बाद अभ्यर्थियों ने इस निर्णय को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति वी. कामेश्वर राव और न्यायमूर्ति मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की खंडपीठ ने कहा कि किसी भी अभ्यर्थी के मामले में अंतिम निर्णय लेने से पहले विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की संशोधित गाइडलाइन और उसके स्पष्टीकरण को ध्यान में रखा जाना आवश्यक है।
अदालत ने कहा कि यूजीसी ने 3 अप्रैल 2025 को हुई अपनी 589वीं बैठक में वर्ष 2022 की गाइडलाइन में संशोधन करते हुए स्पष्ट किया था कि वर्ष 2022 से पहले एक साथ पूरी की गई शैक्षणिक डिग्रियां वैध मानी जाएंगी, बशर्ते वे उस समय लागू नियमों के अनुरूप प्राप्त की गई हों।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि वर्ष 2022 से पहले ऐसी कोई गाइडलाइन प्रभावी नहीं थी, जिसमें एक डिग्री नियमित और दूसरी डिस्टेंस मोड से करने पर रोक लगाई गई हो। इसलिए बाद में लागू नियमों को पूर्व प्रभाव (Retrospective Effect) से लागू करना उचित नहीं होगा।
एनईएसटीएस को फिर से समीक्षा के निर्देश
दिल्ली हाई कोर्ट ने एनईएसटीएस को निर्देश दिया कि वह यूजीसी की संशोधित गाइडलाइन और उसके आधिकारिक स्पष्टीकरण को ध्यान में रखते हुए चारों अभ्यर्थियों के मामलों की दोबारा समीक्षा करे। अदालत ने कहा कि सभी संबंधित तथ्यों और वर्तमान नियमों का परीक्षण करने के बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाए।
इस आदेश के साथ अदालत ने यह संकेत भी दिया कि प्रशासनिक संस्थाओं को भर्ती से जुड़े मामलों में नियमों की सही व्याख्या और समय-सीमा का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
अभ्यर्थियों की दलील को मिली मजबूती
सुनवाई के दौरान अभ्यर्थियों की ओर से दलील दी गई कि वर्ष 2022 से पहले लागू किसी भी नियम में दो डिग्रियां एक साथ करने पर प्रतिबंध नहीं था। इसलिए 2022 में जारी नई यूजीसी गाइडलाइन को पूर्व प्रभाव से लागू कर उनकी उम्मीदवारी रद्द करना पूरी तरह अनुचित और कानून के विपरीत है।
अदालत ने इस तर्क को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति के अधिकारों को बाद में बनाए गए नियमों के आधार पर प्रभावित नहीं किया जा सकता, यदि उस समय उसका कार्य तत्कालीन नियमों के अनुरूप था।
यूजीसी संशोधन का क्या महत्व है?
यूजीसी द्वारा अप्रैल 2025 में जारी संशोधित स्पष्टीकरण का उद्देश्य वर्ष 2022 से पहले की स्थिति को स्पष्ट करना था। इसमें साफ कहा गया कि उस अवधि में प्राप्त समानांतर डिग्रियों को वैध माना जाएगा, यदि संबंधित विश्वविद्यालय और पाठ्यक्रम उस समय के नियमों के अनुरूप संचालित किए गए थे।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्पष्टीकरण से शिक्षा और सरकारी भर्ती से जुड़े कई पुराने विवादों के समाधान का रास्ता खुल सकता है।
हजारों छात्रों को मिल सकती है राहत
दिल्ली हाई कोर्ट के इस फैसले का असर केवल चार अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं रहेगा। देशभर में ऐसे हजारों विद्यार्थी हैं जिन्होंने वर्ष 2022 से पहले नियमित, ओपन या डिस्टेंस मोड के माध्यम से समानांतर डिग्रियां प्राप्त की थीं। कई भर्ती प्रक्रियाओं में उनकी पात्रता पर सवाल उठाए गए थे।
अब इस निर्णय के बाद ऐसे अभ्यर्थियों को अपनी पात्रता साबित करने में कानूनी मजबूती मिल सकती है। साथ ही विभिन्न सरकारी और शैक्षणिक संस्थानों को भी यूजीसी की संशोधित गाइडलाइन के अनुरूप निर्णय लेने होंगे।
दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला शिक्षा क्षेत्र में महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि नियमों का पूर्व प्रभाव से उपयोग कर अभ्यर्थियों के अधिकारों को प्रभावित नहीं किया जा सकता। यदि किसी छात्र ने उस समय लागू नियमों के अनुसार दो डिग्रियां प्राप्त की थीं, तो बाद में बने नियमों के आधार पर उन्हें अमान्य घोषित करना न्यायसंगत नहीं होगा। यह निर्णय भविष्य की भर्ती प्रक्रियाओं और उच्च शिक्षा से जुड़े मामलों में भी महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करेगा।