नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों और तलाक से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत मिलने वाला ‘राइट टू प्राइवेसी’ (निजता का अधिकार) इतना व्यापक नहीं है कि उसका इस्तेमाल पति या पत्नी से जुड़े कथित विवाहेतर संबंध (अफेयर) के साक्ष्यों को अदालत में पेश होने से रोकने के लिए किया जाए। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यदि किसी मामले में न्यायिक निर्णय के लिए मोबाइल कॉल रिकॉर्ड, होटल में ठहरने का रिकॉर्ड या अन्य प्रासंगिक दस्तावेज आवश्यक हों, तो केवल निजता का अधिकार बताकर उन्हें न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत होने से नहीं रोका जा सकता।
यह फैसला वैवाहिक विवादों में साक्ष्यों की स्वीकार्यता और निजता के अधिकार की सीमा को स्पष्ट करने वाला माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इससे भविष्य में तलाक और वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों की सुनवाई में महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है।
क्या है पूरा मामला?
मामला एक पति द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था। पति ने अदालत में यह तर्क दिया कि उसके मोबाइल रिकॉर्ड और होटल में ठहरने से संबंधित जानकारी अदालत में मंगाना उसके मौलिक अधिकारों और निजता के अधिकार का उल्लंघन है। उसने दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि न्यायालय का उद्देश्य किसी व्यक्ति की निजी जिंदगी में अनावश्यक हस्तक्षेप करना नहीं है, बल्कि न्याय सुनिश्चित करना है। यदि किसी मुकदमे के निष्पक्ष निर्णय के लिए ऐसे दस्तावेज आवश्यक हों, तो उन्हें साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सर्वोच्च अदालत ने कहा कि निजता का अधिकार एक महत्वपूर्ण मौलिक अधिकार है, लेकिन यह पूर्ण (Absolute) नहीं है। न्यायिक प्रक्रिया में यदि किसी तथ्य को साबित करने के लिए संबंधित दस्तावेजों की आवश्यकता हो, तो अदालत उन्हें मंगाने का अधिकार रखती है।
पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल यह कहकर कि दस्तावेज निजी हैं, उन्हें अदालत में प्रस्तुत होने से नहीं रोका जा सकता। अदालत प्रत्येक मामले की परिस्थितियों और आवश्यकता को देखते हुए निर्णय लेगी कि कौन-सा साक्ष्य प्रासंगिक है।
तलाक के मामलों पर क्या होगा असर?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से तलाक, वैवाहिक विवाद, गुजारा भत्ता और विवाहेतर संबंधों से जुड़े मामलों में साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया अधिक स्पष्ट होगी। यदि किसी पक्ष को अपने दावे को साबित करने के लिए कॉल रिकॉर्ड, होटल बुकिंग, यात्रा संबंधी जानकारी या अन्य डिजिटल रिकॉर्ड की आवश्यकता होगी, तो अदालत परिस्थितियों के अनुसार उन्हें स्वीकार कर सकती है।
हालांकि अदालत ने यह भी संकेत दिया कि किसी भी व्यक्ति की निजता का अनावश्यक उल्लंघन नहीं होना चाहिए और केवल प्रासंगिक तथा आवश्यक दस्तावेज ही न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बनेंगे।
राइट टू प्राइवेसी क्या है?
भारत में निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा माना जाता है। वर्ष 2017 में सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने ऐतिहासिक फैसले में निजता को मौलिक अधिकार घोषित किया था।
लेकिन अदालत ने यह भी कहा था कि यह अधिकार पूर्ण नहीं है। कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया, सार्वजनिक हित या न्यायिक आवश्यकता होने पर इस अधिकार पर उचित और सीमित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
वरिष्ठ अधिवक्ताओं के अनुसार यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि अदालत में सच्चाई सामने लाने के लिए आवश्यक साक्ष्यों को केवल प्राइवेसी के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। हालांकि जांच और साक्ष्य एकत्र करने की प्रक्रिया कानून के दायरे में ही होनी चाहिए।
विशेषज्ञों का कहना है कि अदालतें प्रत्येक मामले में यह सुनिश्चित करेंगी कि केवल आवश्यक जानकारी ही मांगी जाए और किसी व्यक्ति की निजी जिंदगी का अनावश्यक खुलासा न हो।
डिजिटल साक्ष्यों का बढ़ता महत्व
आज के समय में मोबाइल कॉल रिकॉर्ड, चैट, ई-मेल, लोकेशन डेटा, होटल बुकिंग और डिजिटल लेनदेन जैसे रिकॉर्ड अदालतों में महत्वपूर्ण साक्ष्य बनते जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि यदि ऐसे दस्तावेज न्यायिक निर्णय के लिए आवश्यक हों, तो उन्हें कानूनी प्रक्रिया के तहत अदालत में पेश किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला वैवाहिक विवादों में न्यायिक प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट और संतुलित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने एक ओर निजता के अधिकार के महत्व को स्वीकार किया, वहीं दूसरी ओर यह भी स्पष्ट कर दिया कि न्यायिक प्रक्रिया और सच्चाई की खोज के सामने इस अधिकार का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता। आने वाले समय में यह निर्णय तलाक और विवाहेतर संबंधों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल के रूप में देखा जाएगा।