नई दिल्ली : राजनीति का चक्र बड़ा निर्दयी होता है। जो कभी “आम आदमी” के नाम पर व्यवस्था बदलने निकला था, आज उसी की पार्टी सत्ता, स्वार्थ और अवसरवाद की आँधी में बिखरती दिख रही है। सात राज्यसभा सांसदों का भाजपा में जाना केवल दल-बदल नहीं, यह उस नैतिकता के गुब्बारे की हवा निकलना है जिसे वर्षों तक “ईमानदारी की क्रांति” बताकर उड़ाया गया था। AAP ने अब इन 7 सांसदों की अयोग्यता के लिए राज्यसभा चेयरमैन को याचिका दी है।
केजरीवाल जी की राजनीति का सबसे बड़ा संकट यही है, विचारधारा उधार की थी, सत्ता असली थी; जब सत्ता डगमगाई, तो साथी भी सरक गए। जो कभी दूसरों को भ्रष्ट, बिकाऊ और अवसरवादी कहते थे,आज अपने ही घर की दीवारों पर वही शब्द लौटकर लिखे जा रहे हैं। सच यही है, क्रांति अगर चरित्र से न निकले, तो वह केवल चुनावी नारा बनकर रह जाती है।
इसलिए समय जैसे कह रहा है “केजरीवाल, पुनः मूषक भव!” फिर वहीं लौटिए, जहाँ से शुरुआत हुई थी, न कोई महल, न कोई मसीहाई, सिर्फ एक साधारण राजनीतिक जीव, जो अपनी ही बनाई कथा में फँस गया।
डाॅ कीर्ति शर्मा