जम्मू: जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत की हालिया टिप्पणी का स्वागत करते हुए कहा कि लोकतंत्र में सरकार और देश के बीच अंतर समझना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि छात्रों द्वारा किए गए विरोध-प्रदर्शन को देश विरोधी नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि उनकी मांगें अपने अधिकारों और भविष्य से जुड़ी थीं।
उमर अब्दुल्ला ने कहा कि मोहन भागवत ने ऐसा कोई बयान नहीं दिया जो वास्तविकता से अलग हो। उनके अनुसार, जिन युवाओं और छात्रों ने प्रदर्शन किया, उनका उद्देश्य देश के खिलाफ माहौल बनाना नहीं था, बल्कि अपनी समस्याओं और अधिकारों को लेकर आवाज उठाना था। उन्होंने कहा कि सरकार की नीतियों का विरोध करना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है और इसे राष्ट्र विरोध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
मुख्यमंत्री ने कहा कि लोकतंत्र में नागरिकों को अपनी बात रखने और सरकार से सवाल पूछने का पूरा अधिकार है। यदि किसी नीति या निर्णय से लोग असहमत हैं और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराते हैं, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करता है। उन्होंने कहा कि कई बार सरकार की कमियों और गलतियों की ओर ध्यान दिलाने का काम ऐसे ही विरोध-प्रदर्शन करते हैं, जिससे सुधार की संभावना बनती है।
उमर अब्दुल्ला ने कहा कि मोहन भागवत द्वारा सरकार और देश के बीच स्पष्ट अंतर स्वीकार करना एक सकारात्मक संदेश है। उनके अनुसार, जब स्वयं संघ प्रमुख इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि सरकार का विरोध देश का विरोध नहीं है, तो उन छात्रों के खिलाफ चल रही कार्रवाई पर भी पुनर्विचार होना चाहिए, जिन्होंने अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाई थी। उन्होंने मांग की कि छात्रों के खिलाफ जारी कार्रवाई को तत्काल रोका जाए और उनकी बात को गंभीरता से सुना जाए।
इस दौरान उन्होंने झारखंड की राजधानी रांची में JPSC और JSSC परीक्षाओं से जुड़े अभ्यर्थियों के आंदोलन का भी उल्लेख किया। उमर अब्दुल्ला ने कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं की चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थियों को बातचीत के लिए बुलाएंगे और उनकी समस्याओं का समाधान निकालने का प्रयास करेंगे।
उन्होंने कहा कि संवाद किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे प्रभावी प्रक्रिया है। यदि सरकार और आंदोलनकारी आमने-सामने बैठकर चर्चा करें तो अधिकांश विवादों का समाधान शांतिपूर्ण तरीके से संभव है। उन्होंने यह भी कहा कि युवाओं की अपेक्षाओं और भविष्य से जुड़े मुद्दों पर संवेदनशील रवैया अपनाना हर सरकार की जिम्मेदारी है।
उमर अब्दुल्ला का यह बयान ऐसे समय आया है जब विभिन्न राज्यों में भर्ती परीक्षाओं, रोजगार और छात्र हितों से जुड़े मुद्दों को लेकर आंदोलन तेज हो रहे हैं। ऐसे माहौल में सरकार और जनता के बीच संवाद बढ़ाने की मांग लगातार उठ रही है।
उमर अब्दुल्ला के बयान ने एक बार फिर इस बहस को सामने ला दिया है कि लोकतंत्र में असहमति और विरोध को किस नजरिए से देखा जाना चाहिए। उनका कहना है कि शांतिपूर्ण विरोध लोकतांत्रिक व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा है और इसे राष्ट्रभक्ति या राष्ट्रविरोध की कसौटी पर नहीं परखा जाना चाहिए। उन्होंने सभी सरकारों से युवाओं की आवाज सुनने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की।