नई दिल्ली: देश की अदालतों में फर्जी दस्तावेजों और जाली डिग्रियों के सहारे वकालत करने वाले कथित प्रैक्टिसनर्स को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला और गंभीर मामला सामने आया है। बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया (BAI) के मुताबिक, देश में हर तीन में से एक वकील फर्जी है। कानूनी पेशे की साख पर लगे इस बड़े दाग को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कड़ा रुख अपनाया। शीर्ष अदालत ने फर्जी वकीलों पर पूरी तरह अंकुश लगाने के लिए देश भर के वकीलों की एक राष्ट्रीय डिजिटल रजिस्ट्री बनाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने का फैसला किया है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI), विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) और राज्य बार काउंसिलों से विस्तृत प्रतिक्रिया मांगी है। पीठ ने इस विचार को बेहद ‘नवोन्मेषी’ (Innovative) बताते हुए कहा कि आधुनिक तकनीक की मदद से इसे देश में लागू किया जा सकता है।
अदालत में बीएआइ की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता विपिन नायर और प्रशांत कुमार ने दलील दी कि वर्तमान में वकीलों का कोई केंद्रीयकृत और सार्वजनिक रूप से सत्यापन योग्य राष्ट्रीय रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। प्रस्तावित राष्ट्रीय डिजिटल रजिस्ट्री के तहत:
देश के प्रत्येक प्रामाणिक और नामांकित वकील को एक ‘यूनिक नेशनल एडवोकेट आइडेंटिफायर’ (अद्वितीय राष्ट्रीय वकील पहचानकर्ता) संख्या दी जाएगी।
यह रजिस्ट्री पूरी तरह डिजिटल होगी, जिसमें वकीलों की सत्यापित शैक्षणिक योग्यता और उनके बार नामांकन की वास्तविक स्थिति दर्ज होगी।
इसकी मदद से कोई भी मुवक्किल या अदालत किसी भी कथित वकील की सत्यता की तुरंत ऑनलाइन जांच कर सकेंगे, जिससे फर्जीवाड़ा पूरी तरह खत्म हो जाएगा।
याचिका में फर्जीवाड़ा रोकने के साथ-साथ वकीलों के आचरण को लेकर भी बड़े सुधारों की मांग की गई है। याचिकाकर्ता ने बीसीआई को अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 49 के तहत एक ‘इंटरनेट मीडिया और डिजिटल आचार संहिता’ बनाने का निर्देश देने की मांग की है, ताकि सोशल मीडिया पर वकीलों द्वारा किए जा रहे भ्रामक प्रचार और अनैतिक विज्ञापनों पर रोक लगाई जा सके।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले के व्यापक असर को देखते हुए सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर दिया है और मामले की अगली विस्तृत सुनवाई जुलाई में तय की है।