नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने देश में तेजी से कम होते वन क्षेत्र पर चिंता जताते हुए कहा है कि देशभर में वनों और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) को सहेजने की सख्त जरूरत है। न्यायालय ने विशेष रूप से झारखंड का जिक्र करते हुए कहा कि देश में ऐसे बेहद कम राज्य बचे हैं, जहां हम अपने प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को बचा सकते हैं और झारखंड उनमें से एक है। पीठ ने इन राज्यों को ‘प्राकृतिक स्वर्ग’ करार दिया।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने यह टिप्पणियां झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (जेएसपीसीबी) की ओर से दायर एक विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई के दौरान कीं। जेएसपीसीबी ने झारखंड हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें वनों की सीमाओं के पास पत्थर खनन और स्टोन क्रशर लगाने को लेकर कड़े निर्देश जारी किए गए थे।
झारखंड हाई कोर्ट ने इस साल जनवरी में एक महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया था कि राज्य में संरक्षित वनों की निर्धारित सीमाओं से एक किलोमीटर के भीतर पत्थर खनन या स्टोन क्रशर लगाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। हाई कोर्ट ने यह फैसला जेएसपीसीबी की उस अधिसूचना के खिलाफ सुनाया था, जिसमें वन भूमि के पास खनन की न्यूनतम दूरी को 400-500 मीटर से घटाकर महज 250 मीटर कर दिया गया था। बाद में अप्रैल में हाई कोर्ट ने इसमें आंशिक संशोधन करते हुए पत्थर खनन के लिए 500 मीटर और स्टोन क्रशर के लिए 400 मीटर का बफर जोन (दूरी) तय किया था।
शीर्ष अदालत ने सुनवाई के दौरान जेएसपीसीबी द्वारा दूरी के नियमों को अचानक घटाए जाने पर कड़ा रुख अपनाया। पीठ ने कहा कि चूंकि हाई कोर्ट पहले से ही इस जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से मामले की गहराई से जांच कर रहा है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट इसमें दखल नहीं देगा। सर्वोच्च अदालत के इस कड़े रुख को देखते हुए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वकील ने अपनी याचिका वापस ले ली। कोर्ट ने बोर्ड को अपनी सभी दलीलें हाई कोर्ट के समक्ष ही रखने की छूट दी है।