नयी दिल्ली: अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग को आयकर और अन्य लाभों में क्रीमी लेयर लागू करने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला पूरी तरह से विधायी नीति से जुड़ा हुआ है और इसमें न्यायपालिका दखल देने की इच्छुक नहीं है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि आर्थिक रूप से अत्यंत संपन्न हो चुके कुछ लोगों को भी आरक्षण और कर संबंधी लाभ मिलते रहते हैं, जो समानता के सिद्धांत के अनुरूप नहीं है। याचिका में यह भी कहा गया कि पूर्वोत्तर राज्यों में कुछ आदिवासी समुदायों के लोग, जिन्होंने धर्म परिवर्तन कर लिया है और बड़े शैक्षणिक संस्थानों तथा व्यवसायों का संचालन कर रहे हैं, फिर भी उन्हें इन लाभों का फायदा मिल रहा है।
याचिकाकर्ता ने यह तर्क भी रखा कि ऐसे कई लोग करोड़ों रुपये की आय अर्जित कर रहे हैं, फिर भी उन्हें टैक्स में छूट प्राप्त है, जिससे संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 27 का उल्लंघन होता है। उनका कहना था कि क्रीमी लेयर की अवधारणा लागू कर केवल वास्तविक जरूरतमंद आदिवासियों को ही लाभ मिलना चाहिए।
इस पर मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल इसलिए कि किसी व्यवस्था का दुरुपयोग हो रहा है, इसका मतलब यह नहीं है कि पूरे वर्ग पर संदेह किया जाए। उन्होंने कहा कि यह विषय नीति निर्माण का है और इस पर निर्णय लेना संसद और उसकी समितियों का कार्य क्षेत्र है।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता को सुझाव दिया कि वे अपनी बात संसद की संबंधित समितियों या सरकार के समक्ष रखें, क्योंकि निर्वाचित प्रतिनिधि इस तरह के मुद्दों पर विचार करने के लिए अधिक उपयुक्त मंच हैं।
सुप्रीम कोर्ट के इस रुख के बाद यह साफ हो गया है कि फिलहाल ST आरक्षण और टैक्स छूट में क्रीमी लेयर लागू करने का मामला न्यायपालिका के बजाय विधायी प्रक्रिया के दायरे में ही रहेगा।