हरिहर। सनातन परंपरा में पितरों का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार प्रत्येक मनुष्य अपने पूर्वजों का ऋणी होता है पहले हम ये समझें की पितृ हैं कौन? सनातन के ऋषि मुनियों ने गहन अनुसंधान से जाना परमात्मा का एक अंश टूटकर स्थूल पदार्थ, वनस्पति,जीव जन्तु की एक लम्बी यात्रा 84 लाख से गुजर कर मनुष्य योनी तक आता है ।मनुष्य योनी ही वह योनी है ।जहाँ से वह देव योनी में प्रवेश कर आगे की यात्रा करता है ।जो लोग चेतन होकर शरीर छोडते हैं । देवत्व को प्राप्त हो आगे की गति करते हैं अन्य पुनः जन्म लेकर कर्म बीज के अनुसार बार बार मरते हैं ,पुनः जन्म लेते हैं ।जब तक की आत्मा पुर्ण गुरूओं के बताये मार्ग से इससे निकल नहीं जाते ।
पहले साधारणत मनुष्य नया जन्म ले लेता था ,परन्तु कालखंड में वे विधियाँ लुप्त या दूषित हो गयी ।न वैसे साधक बचे जो इस कर्मकांड को करवाते थे ।प्रभाव यह हुआ की पितृ मुक्ति होनी बंद हो गयी ।आज जो कर्मकांड हम करते हैं उससे सुक्ष्म मुक्त नहीं हो पाता है ।
प्रकृति की एक व्यव्स्था है कि ऐसा सुक्ष्म ,परिवार के लोगों में ही रहता है ।जब तक की उसे मुक्त न कर दिया जाये (वैदिक कर्मकांड के द्वारा) परिणाम यह हुआ कि पितृ संख्या अधिक होती गई, वह अपने कर्म भोग जीवित परिवार में काटने लगे जो आज 95% समस्याओ का कारण है।वे अज्ञानता में परिवार के साथ शत्रुवत व्यवहार करने लगते हैं ।जिससे परिवार का ध्यान उनकी ओर आकर्षित हो व वे मुक्त होकर प्रकृति के अगले चरण में गति करें । (वे सही कर्मकांड के आभाव में शरीर में रहने को मजबूर होते हैं )
आज अधिक संख्या में पितृ फंसे होने से उनके स्थूल, मानसिक रोग परिवार के जीवित लोगों में आ जाते हैं( वे अपना भोग काट रहे हैं ) ,अह्सास कराने के लिए वे जीवित सदस्यों को कष्ट देते हैं ,उनके बनते काम खराब कर देते हैं ।वे मस्तिष्क पर नियंत्रण करने में सक्षम होते हैं ।आपको पता भी नहीं चलता ,आपसे ही गलती करवा कर आपके काम बिगाड देतें हैं ।आपको गलती करने का अह्सास ही नहीं होता ।(मस्तिष्क पर नियंत्रण होता है )
विशेष 1- ये ऊर्जा परिवार के हर सदस्यों में फैली होती है ।
2- जन्म के समय जिनकी ग्रह दशा कमजोर होती है ।उस पर सबसे अधिक प्रभाव होता है ।
3- इनकी आशायें,इच्छा ,विचार, प्राण(स्मृतयों के )भी होते हैं ।
4- पितृ मुक्त होने के बाद भी अन्य सदस्य जो अनुष्ठान में सम्मिलित नहीं हैं ।उनमें आशायें ,इच्छा ,विचार, प्राण(स्मृति के ), रहते हैं ।
5- स्मृति नयी स्मृति बना सकती है ।सुक्ष्म की तरह ही सोचने समझने में सक्षम होती है ।
6- अगर एक भाई ने अनुष्ठान किया है ,DNA में 5 लोग हैं ।पितृ तो मुक्त हो जायेगा ।पर दूसरे भाई के परिवार को पितृ की स्मृति परेशान करती
है ।जैसे पितृ कर रहा होता है ।वास्तव में पितृ तो मुक्त हो जाता है ।लेकिन स्मृति सुक्ष्म की तरह ही व्यवहार करती है ।
7- मरते समय के कष्ट सुक्ष्म में बने रहते हैं ।दरबार मुक्ति पुर्व उन्हे निरोगी भी करता है ।
दरबार का अनुसंधान कहता है । मनुष्य की 95% समस्याओ के लिए पितृ उतरदायि होते हैं । अतः ये अनिवार्य चिकित्सा का अंग है। पितृ ऋण को इसी कारण सबसे बडा ऋण माना गया है ।
धार्मिक विद्वानों का मानना है कि पूर्वजों के प्रति सम्मान केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके आदर्शों का पालन करना, परिवार की परंपराओं का सम्मान करना तथा समाज के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करना भी पितृ ऋण चुकाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। गौरतलब है कि पितृ दोष और पितृ मुक्ति जैसे विषय आस्था और धार्मिक विश्वास से जुड़े हैं। विभिन्न संप्रदायों एवं आध्यात्मिक संस्थाओं के विचार अलग-अलग हो सकते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इन मान्यताओं की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन करोड़ों श्रद्धालु अपनी धार्मिक आस्था के अनुसार श्राद्ध, तर्पण और पितृ पूजा जैसे अनुष्ठानों का पालन करते हैं। सनातन संस्कृति में पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने की यह परंपरा आज भी समाज में व्यापक रूप से प्रचलित है।