ढाका: बांग्लादेश में चीन से बिजली खरीद को लेकर सरकार और विपक्षी आवाजों के बीच विवाद गहराता जा रहा है। महंगी बिजली खरीदने के फैसले पर सवाल उठने और ढाका में विरोध प्रदर्शन होने के बावजूद बांग्लादेश सरकार 2 सितंबर को बीजिंग में एक समझौते की तैयारी कर रही है। प्रस्तावित करार के तहत चीन की कंपनी से लंबे समय तक बिजली खरीदने की योजना है।
विवाद का मुख्य कारण बिजली की प्रस्तावित कीमत है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, बांग्लादेश चीन से करीब 17.85 रुपये प्रति यूनिट की दर पर बिजली खरीदने जा रहा है। इसकी तुलना भारत से मिलने वाली बिजली की करीब 10.60 रुपये प्रति यूनिट दर से की जा रही है। इस अंतर को लेकर बांग्लादेश में सवाल उठ रहे हैं कि आर्थिक दबाव के दौर में सरकार अपेक्षाकृत महंगी बिजली खरीदने का फैसला क्यों कर रही है।
बांग्लादेश के ऊर्जा मंत्री इकबाल हसन ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के कार्यकाल में भारतीय कंपनी से हुए बिजली समझौते पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि उस समय देश के हितों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। हालांकि, मौजूदा सरकार के चीन के साथ प्रस्तावित समझौते को लेकर भी आलोचना शुरू हो गई है। कंज्यूमर्स एसोसिएशन ऑफ बांग्लादेश के ऊर्जा सलाहकार डॉ. एम. शम्सुल आलम ने महंगी बिजली खरीदने के फैसले पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि देश पहले ही आर्थिक दबाव और बिजली संकट का सामना कर रहा है। ऐसे समय में अधिक कीमत पर बिजली खरीदना उपभोक्ताओं और सरकारी वित्त पर अतिरिक्त बोझ डाल सकता है।
प्रस्तावित समझौते के तहत चीनी कंपनी सीएमईसी के साथ करार किए जाने की बात कही जा रही है। इसके अनुसार बांग्लादेश पावर डेवलपमेंट बोर्ड को 25 वर्षों तक लगभग 42 से 42.5 मेगावाट बिजली खरीदनी होगी। लंबी अवधि का यह करार बिजली की कीमत और भविष्य में सरकार पर पड़ने वाले वित्तीय भार को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस पूरे घटनाक्रम को बांग्लादेश के ऊर्जा क्षेत्र में चीन की बढ़ती मौजूदगी से जोड़कर भी देखा जा रहा है। चीन पहले से ही बांग्लादेश के बुनियादी ढांचे और ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश कर रहा है। तीस्ता नदी से जुड़े प्रस्तावित जलविद्युत विकास सहित कई परियोजनाओं में चीनी भागीदारी की चर्चा रही है।

बांग्लादेश की राजधानी ढाका में कचरे से बिजली बनाने की परियोजना भी इसी व्यापक ऊर्जा सहयोग का हिस्सा बताई जा रही है। योजना के तहत शहर में रोजाना निकलने वाले हजारों टन कचरे का इस्तेमाल बिजली उत्पादन के लिए किया जाना है। इस तरह की परियोजनाओं में चीनी कंपनियों की भागीदारी से बीजिंग को बांग्लादेश के ऊर्जा और बुनियादी ढांचा क्षेत्र में अपनी भूमिका बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। कुछ रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि भविष्य में ऐसे बिजली संयंत्रों से म्यांमार तक बिजली आपूर्ति की संभावना तलाशी जा रही है। हालांकि, इन योजनाओं की वास्तविक स्थिति और समयसीमा संबंधित समझौतों और परियोजनाओं की प्रगति पर निर्भर करेगी।
ऐसे में चीन से बिजली खरीद का प्रस्ताव केवल ऊर्जा व्यापार तक सीमित मुद्दा नहीं माना जा रहा। इसे बांग्लादेश की विदेश नीति और आर्थिक साझेदारियों में संभावित बदलाव के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। भारत और चीन दोनों बांग्लादेश के महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार हैं और ढाका के लिए दोनों देशों के साथ संतुलन बनाए रखना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। महंगी बिजली खरीद के विरोध में प्रदर्शन और विशेषज्ञों की आपत्तियां सरकार के सामने आर्थिक चुनौती को रेखांकित करती हैं। यदि बिजली की लागत अधिक रहती है तो उसका असर सरकारी वित्तीय व्यवस्था, बिजली वितरण कंपनियों और अंततः उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।
दूसरी ओर, सरकार के सामने ऊर्जा की बढ़ती मांग पूरी करने और बिजली आपूर्ति को स्थिर बनाए रखने की चुनौती है। यदि प्रस्तावित चीनी परियोजनाओं से बिजली उत्पादन और आपूर्ति क्षमता में वृद्धि होती है, तो इससे ऊर्जा संकट से निपटने में मदद मिल सकती है। लेकिन इसकी कीमत और दीर्घकालिक वित्तीय प्रभाव इस सहयोग की सफलता का महत्वपूर्ण पैमाना होंगे। फिलहाल 2 सितंबर को प्रस्तावित समझौते पर सभी की नजर है। करार की अंतिम शर्तें सामने आने के बाद यह स्पष्ट होगा कि बांग्लादेश को चीन से बिजली खरीदने के बदले आर्थिक और ऊर्जा क्षेत्र में क्या लाभ मिलते हैं। साथ ही यह भी तय होगा कि महंगी बिजली को लेकर उठ रहे सवालों का सरकार किस तरह जवाब देती है।