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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, जब्त गाड़ियां मालिकों को लौटेंगी

नई दिल्ली। पुलिस थानों में लंबे समय तक खड़े रहने वाले जब्त वाहनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी वाहन को केवल इसलिए वर्षों तक पुलिस स्टेशन में खड़ा रखकर खराब होने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता कि उससे संबंधित आपराधिक मामले की […]

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  • September 4, 2026 7:30 pm IST, Published 3 hours ago

नई दिल्ली। पुलिस थानों में लंबे समय तक खड़े रहने वाले जब्त वाहनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी वाहन को केवल इसलिए वर्षों तक पुलिस स्टेशन में खड़ा रखकर खराब होने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता कि उससे संबंधित आपराधिक मामले की सुनवाई अभी पूरी नहीं हुई है। उपयुक्त परिस्थितियों में अदालत वाहन की अंतरिम कस्टडी उसके मालिक को सौंप सकती है, जबकि मामले से जुड़े साक्ष्य को पंचनामा, फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के जरिए सुरक्षित रखा जा सकता है।

यह फैसला M/s ABC Express बनाम State of Gujarat मामले में 2 सितंबर 2026 को न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने सुनाया। मामला गुजरात में शराब की कथित अवैध ढुलाई के दौरान जब्त किए गए एक व्यावसायिक ट्रक की अंतरिम कस्टडी से जुड़ा था। सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत, सत्र अदालत और गुजरात हाईकोर्ट के उन आदेशों को निरस्त कर दिया, जिनमें वाहन को मालिक को अंतरिम रूप से सौंपने से इनकार किया गया था।

थाने में खड़ी गाड़ी का क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में वाहन को लंबे समय तक पुलिस स्टेशन में खड़ा रखने के व्यावहारिक नुकसान पर विशेष ध्यान दिया। अदालत के अनुसार, जब्त वाहन खुले में पड़े रहने से मौसम की मार झेलते हैं और धीरे-धीरे उनकी स्थिति खराब होती जाती है। वाहन लंबे समय तक इस्तेमाल न होने के कारण अपनी उपयोगिता और बाजार मूल्य खो सकता है। इसके अलावा महंगे पुर्जों के चोरी होने या निकाल लिए जाने की आशंका भी रहती है।

अदालत ने यह भी माना कि किसी व्यावसायिक वाहन के लंबे समय तक खड़े रहने से उसके मालिक को आर्थिक नुकसान होता है। खासतौर पर ट्रक या अन्य कमर्शियल वाहन कई लोगों की आजीविका का साधन होते हैं। ऐसे वाहन का इस्तेमाल बंद होने का सीधा असर मालिक के कारोबार और आय पर पड़ सकता है।

गुजरात के शराब मामले में जब्त हुआ था ट्रक

जिस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया, उसमें एक अशोक लेलैंड ट्रक को गुजरात में रोका गया था। जांच के दौरान वाहन से 8,064 बोतल इंडियन मेड फॉरेन लिकर (IMFL) बरामद होने का आरोप था। बरामद शराब की मात्रा करीब 22,532.253 लीटर बताई गई और इसकी कीमत लगभग 17.02 लाख रुपये आंकी गई थी। शराब को खाने-पीने के सामान की खेप के बीच छिपाकर ले जाने का आरोप था।

इस मामले में गुजरात प्रोहिबिशन एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत कार्रवाई की गई और चार आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई। ट्रक के मालिक की ओर से वाहन की अंतरिम कस्टडी मांगते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया गया था।

हालांकि निचली अदालत ने मांग स्वीकार नहीं की। इसके बाद सत्र अदालत और फिर गुजरात हाईकोर्ट ने भी वाहन को अंतरिम कस्टडी में देने से इनकार कर दिया। मामला आखिरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट ने कानून की इस बात को किया स्पष्ट

इस मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल यह था कि क्या गुजरात प्रोहिबिशन एक्ट की धारा 98(2) जब्त वाहन को मुकदमे के दौरान उसके मालिक को सौंपने पर पूरी तरह रोक लगाती है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस प्रावधान को जब्त वाहन की अंतरिम कस्टडी पर पूर्ण और अपरिवर्तनीय रोक के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता। अदालत को मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए अंतरिम कस्टडी पर उचित आदेश देने की शक्ति हासिल है।

अदालत ने आपराधिक प्रक्रिया से जुड़े प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि जब्त संपत्ति को मुकदमे के दौरान किस तरह सुरक्षित रखा जाए, इस संबंध में न्यायालय को व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। मौजूदा कानूनी व्यवस्था में BNSS की धारा 497, पुराने CrPC की धारा 451 से संबंधित है। इसका उद्देश्य यह भी है कि मुकदमे के दौरान संपत्ति बेवजह नष्ट या बेकार न हो।

सबूत बचाने के लिए गाड़ी थाने में रखना जरूरी नहीं

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सबसे अहम पहलू यही है कि वाहन को सबूत के नाम पर वर्षों तक पुलिस स्टेशन में खड़ा रखना हमेशा जरूरी नहीं है। अदालत ने माना कि वाहन की स्थिति का विस्तृत पंचनामा, तस्वीरें और वीडियो तैयार कर लिए जाएं तो साक्ष्य की स्थिति को रिकॉर्ड पर सुरक्षित रखा जा सकता है।

इससे जांच और मुकदमे की जरूरत भी पूरी हो सकती है और वाहन के मालिक को अनावश्यक आर्थिक नुकसान से भी बचाया जा सकता है।

हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि हर जब्त वाहन अपने आप मालिक को वापस मिल जाएगा। अंतरिम कस्टडी देना संबंधित अदालत के विवेक और मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। अदालत आवश्यक शर्तें भी लगा सकती है।

15 लाख रुपये की सुरक्षा पर ट्रक सौंपने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित ट्रक को अंतरिम कस्टडी में सौंपने के लिए कई शर्तें निर्धारित कीं। वाहन के मालिक को 15 लाख रुपये का व्यक्तिगत बॉन्ड और उपयुक्त सुरक्षा देने का निर्देश दिया गया। साथ ही मालिक को यह भी आश्वासन देना होगा कि जांच अधिकारी या ट्रायल कोर्ट जब भी वाहन प्रस्तुत करने के लिए कहेगा, वह उसे उपलब्ध कराएगा।

इसके अलावा मुकदमे के लंबित रहने तक वाहन को बेचने या उस पर किसी तीसरे पक्ष का अधिकार बनाने की अनुमति नहीं होगी। वाहन सौंपने से पहले जांच अधिकारी को उसकी स्थिति का विस्तृत पंचनामा तैयार करना होगा और फोटो तथा वीडियो भी रिकॉर्ड करनी होगी। यह प्रक्रिया वाहन सौंपते समय मालिक के अधिकृत प्रतिनिधि और दो स्वतंत्र गवाहों की मौजूदगी में पूरी की जानी है।

फैसले का मतलब हर वाहन मालिक के लिए क्या है?

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला जब्त वाहनों के मालिकों के लिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है। खासतौर पर वे लोग जिनके ट्रक, कार, बस या अन्य वाहन लंबे समय से पुलिस या अदालत की कस्टडी में पड़े हैं, उनके मामलों में अंतरिम कस्टडी मांगने का रास्ता मजबूत हो सकता है।

लेकिन यह समझना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने सभी मामलों में स्वतः वाहन लौटाने का आदेश नहीं दिया है। प्रत्येक मामले में अपराध की प्रकृति, वाहन की भूमिका, जांच की स्थिति, जब्ती से संबंधित कानून और साक्ष्य की जरूरत जैसे पहलुओं पर विचार किया जाएगा।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके फैसले में की गई टिप्पणियां केवल वाहन की अंतरिम कस्टडी के सवाल तक सीमित हैं। इससे लंबित आपराधिक मुकदमे के गुण-दोष पर कोई राय नहीं बनती। यानी वाहन मालिक को अंतरिम कस्टडी मिल जाने का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित आरोप खत्म हो गए या आरोपी को मामले में क्लीन चिट मिल गई।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का संदेश साफ है—कानूनी प्रक्रिया के दौरान किसी मूल्यवान वाहन को अनिश्चित समय तक थाने में खड़ा रखकर उसे जर्जर होने देना न्याय का उद्देश्य नहीं हो सकता। जहां वाहन को सुरक्षित रखने के लिए पंचनामा, फोटो और वीडियो पर्याप्त हों तथा अदालत आवश्यक शर्तें लगा सकती हो, वहां परिस्थितियों के अनुसार मालिक को अंतरिम कस्टडी देने पर विचार किया जा सकता है।

इस फैसले से एक तरफ जब्त संपत्ति के संरक्षण का सवाल सामने आता है, तो दूसरी तरफ उन वाहन मालिकों की आर्थिक परेशानी भी सामने आती है जिनकी रोजी-रोटी उनके वाहन से जुड़ी होती है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी संतुलन को ध्यान में रखते हुए गुजरात के मामले में ट्रक को अंतरिम कस्टडी में सौंपने का रास्ता साफ किया है।

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