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दिल्ली में 5 करोड़ चेहरों पर AI की नजर, Safe City का प्लान

नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था को तकनीक से जोड़ने की दिशा में एक बड़ा बदलाव सामने आया है। शहर में तेजी से बढ़ रहे कैमरा नेटवर्क को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI आधारित निगरानी व्यवस्था से जोड़ने की तैयारी की चर्चा है। इस व्यवस्था का उद्देश्य सिर्फ सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर लगे कैमरों […]

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  • September 6, 2026 8:41 pm IST, Published 1 hour ago

नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था को तकनीक से जोड़ने की दिशा में एक बड़ा बदलाव सामने आया है। शहर में तेजी से बढ़ रहे कैमरा नेटवर्क को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI आधारित निगरानी व्यवस्था से जोड़ने की तैयारी की चर्चा है। इस व्यवस्था का उद्देश्य सिर्फ सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर लगे कैमरों से घटनाओं को रिकॉर्ड करना नहीं, बल्कि कैमरों से मिलने वाली जानकारी का तकनीकी विश्लेषण कर संदिग्ध गतिविधियों तक पुलिस की पहुंच को तेज करना है।

सोशल मीडिया पर सामने आई जानकारी के मुताबिक, प्रस्तावित Safe City Project के तहत बड़ी संख्या में लोगों के चेहरों की पहचान और उनसे संबंधित जानकारी का विश्लेषण करने वाली तकनीक इस्तेमाल किए जाने की बात कही जा रही है। दावा है कि करीब 5 करोड़ चेहरों से जुड़े डेटा के स्तर पर AI आधारित निगरानी की क्षमता विकसित करने की दिशा में काम हो रहा है। हालांकि, इस आंकड़े और परियोजना के सभी तकनीकी पहलुओं की आधिकारिक पुष्टि को अलग-अलग स्तर पर देखना जरूरी है।

कैमरों का नेटवर्क बनेगा AI की आंख

दिल्ली में पहले से ही अलग-अलग इलाकों में बड़ी संख्या में CCTV कैमरे लगाए गए हैं। बाजार, प्रमुख सड़कें, चौराहे, सार्वजनिक स्थान और संवेदनशील इलाके कैमरा निगरानी के दायरे में आते हैं। AI तकनीक के जुड़ने के बाद इन कैमरों से आने वाली तस्वीरों और वीडियो का विश्लेषण स्वचालित तरीके से किया जा सकता है।

सामान्य CCTV व्यवस्था में किसी घटना के बाद पुलिस को रिकॉर्डिंग देखकर संदिग्ध व्यक्ति या वाहन की पहचान करनी पड़ सकती है। AI आधारित सिस्टम इस प्रक्रिया को काफी तेज कर सकता है। किसी व्यक्ति के चेहरे, कपड़ों, गतिविधियों या वाहन नंबर जैसी विशेषताओं के आधार पर उपलब्ध फुटेज में मिलान तलाशना इसका संभावित हिस्सा हो सकता है।

यही वजह है कि Safe City जैसी परियोजनाओं को कानून-व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण तकनीकी कदम माना जाता है।

संदिग्ध व्यक्ति तक पहुंच आसान होने का दावा

AI निगरानी व्यवस्था का सबसे बड़ा संभावित फायदा पुलिस की जांच प्रक्रिया में तेजी हो सकता है। उदाहरण के लिए यदि किसी इलाके में अपराध होता है और संदिग्ध व्यक्ति की तस्वीर उपलब्ध है, तो तकनीकी प्रणाली कैमरों के रिकॉर्ड में उससे मिलती-जुलती जानकारी तलाशने में मदद कर सकती है।

इसी तरह किसी संदिग्ध वाहन की नंबर प्लेट की पहचान कर उसके संभावित मूवमेंट का पता लगाने में भी AI आधारित कैमरा नेटवर्क उपयोगी हो सकता है। इससे पुलिस को घटनास्थल से जुड़े सुराग जल्दी मिल सकते हैं और जांच का दायरा कम समय में तय किया जा सकता है।

हालांकि, AI द्वारा मिले किसी संभावित मिलान को अपने आप अपराध का प्रमाण नहीं माना जा सकता। अंतिम कार्रवाई के लिए पुलिस जांच और अन्य साक्ष्यों की जरूरत बनी रहती है।

5 करोड़ चेहरों की बात क्यों चर्चा में है?

इस परियोजना से जुड़ी सबसे ज्यादा चर्चा 5 करोड़ चेहरों के आंकड़े को लेकर है। यह संख्या किसी एक दिन कैमरों के सामने आने वाले लोगों की संख्या नहीं समझी जानी चाहिए। बड़े शहर में लंबे समय तक अलग-अलग कैमरों से एकत्र होने वाली तस्वीरों और संभावित पहचान संबंधी डेटा की क्षमता को लेकर ऐसे आंकड़े सामने आ सकते हैं।

चेहरा पहचानने वाली तकनीक में किसी व्यक्ति की तस्वीर को उपलब्ध डेटाबेस या कैमरा फुटेज में मौजूद चेहरों से मिलाने की प्रक्रिया की जाती है। तकनीक की सटीकता रोशनी, कैमरे की गुणवत्ता, चेहरे का कोण, भीड़ और अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करती है।

इसलिए AI सिस्टम को पुलिस के लिए एक सहायक तकनीकी उपकरण के रूप में समझना ज्यादा उचित है, न कि ऐसा सिस्टम जो हर स्थिति में सौ फीसदी सही परिणाम देगा।

सुरक्षा के साथ निजता की चुनौती

AI आधारित निगरानी के विस्तार के साथ लोगों की Privacy और Data Security को लेकर सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। जब किसी शहर में बड़ी संख्या में लोगों के चेहरे कैमरों के माध्यम से रिकॉर्ड और विश्लेषित किए जाते हैं, तो यह जरूरी हो जाता है कि डेटा का इस्तेमाल किस उद्देश्य से होगा, उसे कितने समय तक रखा जाएगा और कौन-कौन सी एजेंसियां उस तक पहुंच सकती हैं।

विशेषज्ञों के स्तर पर दुनिया भर में फेस रिकग्निशन तकनीक को लेकर यही सवाल उठते रहे हैं। गलत पहचान की स्थिति में किसी निर्दोष व्यक्ति पर संदेह पैदा होने का जोखिम भी मौजूद रहता है। इसलिए ऐसी तकनीक के साथ स्पष्ट नियम, निगरानी व्यवस्था और डेटा सुरक्षा के मजबूत प्रावधान जरूरी माने जाते हैं।

दिल्ली में बदल सकता है पुलिसिंग का तरीका

यदि AI आधारित Safe City व्यवस्था बड़े स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो दिल्ली पुलिस की निगरानी और जांच प्रणाली में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकते हैं। पारंपरिक गश्त और CCTV निगरानी के साथ डेटा विश्लेषण को जोड़कर घटनाओं की पहचान और जांच को अधिक तकनीकी बनाया जा सकता है।

किसी घटना के बाद कई घंटों की CCTV फुटेज खंगालने के बजाय AI संभावित संदिग्ध गतिविधियों या चेहरे के मिलान को प्राथमिकता के आधार पर सामने ला सकता है। इससे पुलिस का समय बच सकता है और जांच में शुरुआती सुराग जल्दी मिल सकते हैं।

लेकिन इस पूरी व्यवस्था की सफलता केवल कैमरों की संख्या पर निर्भर नहीं करेगी। कैमरों की गुणवत्ता, नेटवर्क की विश्वसनीयता, AI मॉडल की सटीकता, डेटा प्रबंधन और प्रशिक्षित पुलिसकर्मियों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी।

आम लोगों पर क्या पड़ेगा असर?

आम नागरिक के लिए इसका सीधा मतलब यह हो सकता है कि दिल्ली के सार्वजनिक स्थानों पर कैमरा निगरानी और ज्यादा तकनीकी हो जाए। जहां पहले कैमरा सिर्फ रिकॉर्डिंग करता था, वहां AI सिस्टम रिकॉर्डिंग का विश्लेषण करने में सक्षम हो सकता है।

इससे अपराध की जांच में तेजी आने और संदिग्ध गतिविधियों की पहचान बेहतर होने की उम्मीद है। दूसरी तरफ, नागरिकों के निजी डेटा और चेहरे से जुड़ी जानकारी के इस्तेमाल को लेकर पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी होगी।

Safe City Project का मूल उद्देश्य शहर को अधिक सुरक्षित बनाना है, लेकिन AI निगरानी के बढ़ते इस्तेमाल के साथ सुरक्षा और निजता के बीच संतुलन बनाए रखना बड़ी चुनौती होगी। आने वाले समय में परियोजना से जुड़े आधिकारिक नियम, तकनीकी ढांचा और डेटा प्रबंधन व्यवस्था यह तय करेगी कि दिल्ली की AI आधारित निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी और जवाबदेह साबित होती है।

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