यह पूरा मामला 7 अगस्त 2012 का है। मृतक तहल चंद के परिवार के मुताबिक, वह अंबाला छावनी जाने के लिए ट्रेन में यात्रा कर रहे थे। इसी यात्रा के दौरान वह ट्रेन से नीचे गिर गए, जिसके चलते उनकी मौत हो गई। बाद में उनका शव रेलवे ट्रैक के नजदीक मिला था। घटना के बाद परिवार ने रेलवे से मुआवजे की मांग की थी। परिजनों की ओर से अपने दावे के समर्थन में महत्वपूर्ण दस्तावेज पेश किए गए थे। इनमें मृतक की जेब से बरामद असली रेल टिकट और पोस्टमार्टम रिपोर्ट प्रमुख थे। परिवार का पक्ष था कि ये दस्तावेज इस बात की पुष्टि करते हैं कि तहल चंद रेल यात्रा पर थे और उनकी मृत्यु ट्रेन से गिरने के कारण हुई थी। इसके बावजूद रेलवे दावा अधिकरण ने मुआवजे की मांग को खारिज कर दिया था।
अधिकरण के फैसले से असंतुष्ट होकर मृतक के परिवार ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अपील में दलील दी गई कि मामले में मौजूद महत्वपूर्ण साक्ष्यों पर उचित तरीके से विचार नहीं किया गया। मृतक के पास से मिला वास्तविक रेल टिकट उसकी यात्रा से जुड़ा अहम प्रमाण था। वहीं पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी मृत्यु की परिस्थितियों को समझने के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज थी। हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान इन साक्ष्यों को ध्यान में रखा। अदालत ने पाया कि उपलब्ध दस्तावेजों और परिस्थितियों पर समुचित विचार किए बिना मुआवजे का दावा खारिज करना उचित नहीं था। रेलवे टिकट और पोस्टमार्टम रिपोर्ट जैसे महत्वपूर्ण प्रमाणों को नजरअंदाज किए जाने के आधार पर अदालत ने अधिकरण के आदेश को रद्द कर दिया।
अदालत ने मृतक के परिवार की स्थिति को ध्यान में रखते हुए रेलवे को कुल आठ लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया। इस राशि के भुगतान के लिए रेलवे को चार सप्ताह का समय दिया गया है। यदि निर्धारित अवधि के भीतर भुगतान नहीं किया जाता है तो रेलवे को 12 प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज भी चुकाना होगा। इस आदेश के बाद मृतक की पत्नी, दो बेटियों और मां को मुआवजा मिलने का रास्ता खुल गया है।
यह मामला रेलवे दुर्घटनाओं में मुआवजे के दावों की सुनवाई के दौरान दस्तावेजी साक्ष्यों के महत्व को भी सामने लाता है। किसी यात्री की मृत्यु के बाद उसके परिवार के लिए घटना से जुड़े प्रमाण बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। रेल टिकट, मेडिकल रिकॉर्ड, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य उपलब्ध दस्तावेज मामले की परिस्थितियों को समझने में मदद करते हैं। तहल चंद के परिवार को न्याय पाने के लिए लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। वर्ष 2012 में हुई घटना के बाद परिवार ने मुआवजे के लिए कानूनी लड़ाई जारी रखी। अब हाईकोर्ट के आदेश से परिजनों को आर्थिक राहत मिलने की उम्मीद है। अदालत के इस फैसले ने यह भी स्पष्ट किया है कि मुआवजे से जुड़े मामलों में उपलब्ध महत्वपूर्ण साक्ष्यों का निष्पक्ष और उचित मूल्यांकन आवश्यक है।