राजनीतिक गलियारों में यह माना जा रहा था कि आरएलएम कोटे से मंत्री दीपक प्रकाश को विधान परिषद भेजा जा सकता है। लेकिन अंतिम निर्णय में पार्टी को कोई सीट नहीं मिली। इसके बाद आरएलएम के राजनीतिक भविष्य और गठबंधन में उसकी भूमिका को लेकर नई चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया है।
पार्टी नेतृत्व की ओर से फिलहाल सार्वजनिक रूप से कोई असंतोष व्यक्त नहीं किया गया है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधान परिषद चुनाव में प्रतिनिधित्व नहीं मिलना आरएलएम के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा सकता है। ऐसे में आने वाले समय में गठबंधन के भीतर सीटों के बंटवारे और राजनीतिक भागीदारी को लेकर नए समीकरण बनते दिखाई दे सकते हैं।
बिहार की राजनीति में छोटे सहयोगी दलों की भूमिका हमेशा अहम रही है। ऐसे में विधान परिषद चुनाव के इस घटनाक्रम को केवल एक चुनावी फैसला नहीं, बल्कि भविष्य की राजनीतिक रणनीतियों के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आरएलएम आगामी राजनीतिक परिस्थितियों में अपनी स्थिति को किस तरह मजबूत करने का प्रयास करती है।