तारीख पर तारीख का दौर खत्म? FIR से सुप्रीम कोर्ट तक 3 साल

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने नए आपराधिक कानूनों के पूर्ण क्रियान्वयन को लेकर बड़ा दावा किया है।

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  • October 4, 2026 8:51 pm IST, Published 44 minutes ago

भोपाल: केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने नए आपराधिक कानूनों के पूर्ण क्रियान्वयन को लेकर बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा कि भारत की न्याय व्यवस्था को लंबे समय से मामलों में देरी और लगातार तारीख मिलने की समस्या के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन नए आपराधिक कानूनों के पूरी तरह लागू होने के बाद न्याय प्रक्रिया में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। शाह के मुताबिक, FIR दर्ज होने से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक न्याय की प्रक्रिया तीन साल के भीतर पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है।

अमित शाह ने यह बात मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में नए आपराधिक कानूनों पर आयोजित एक प्रदर्शनी का उद्घाटन करने के बाद कही। BHEL क्षेत्र के दशहरा मैदान में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने नए कानूनों के प्रावधानों, न्याय व्यवस्था में तकनीक के इस्तेमाल और अपराधों की जांच को आधुनिक बनाने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों का उल्लेख किया।

नए कानूनों से न्याय व्यवस्था में बदलाव की उम्मीद

गृह मंत्री ने कहा कि भारत की न्याय व्यवस्था को पहले ‘तारीख पर तारीख’ जैसी स्थिति के कारण आलोचनाओं का सामना करना पड़ता था। उनका कहना है कि नए आपराधिक कानूनों के पूर्ण क्रियान्वयन के बाद न्याय व्यवस्था अधिक आधुनिक और तकनीक आधारित होगी।

यहां यह समझना जरूरी है कि तीन साल में न्याय मिलने की बात सरकार द्वारा निर्धारित लक्ष्य और सुधार की दिशा के रूप में कही गई है। इसका अर्थ यह नहीं है कि मौजूदा समय में हर आपराधिक मामले के लिए कानून ने स्वतः तीन साल की अनिवार्य समयसीमा तय कर दी है। कुछ कानूनी विशेषज्ञों ने भी इसे व्यापक न्यायिक सुधार के लक्ष्य के रूप में समझने पर जोर दिया है।

शाह ने कहा कि नए आपराधिक कानूनों में विज्ञान और तकनीक को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। फॉरेंसिक जांच, डिजिटल साक्ष्य और आधुनिक जांच प्रणाली के इस्तेमाल से आपराधिक मामलों की जांच को अधिक प्रभावी बनाने की कोशिश की जा रही है।

1 जुलाई 2024 से लागू हुए तीन नए कानून

भारत में आपराधिक न्याय व्यवस्था से जुड़े तीन प्रमुख नए कानून 1 जुलाई 2024 से लागू हुए। इनमें भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) शामिल हैं। इन कानूनों ने क्रमशः भारतीय दंड संहिता (IPC), दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के पुराने प्रावधानों की जगह ली।

सरकार का तर्क है कि नए कानूनों में आपराधिक न्याय व्यवस्था को मौजूदा दौर की जरूरतों के अनुरूप बनाया गया है। इसमें तकनीक, फॉरेंसिक विज्ञान और डिजिटल साक्ष्यों की भूमिका बढ़ाई गई है। साथ ही महिलाओं की सुरक्षा, आतंकवाद, भीड़ हिंसा और गुमशुदा बच्चों से जुड़े मामलों में भी प्रावधानों को अधिक स्पष्ट बनाने की कोशिश की गई है।

अमित शाह ने कहा कि इन कानूनों का उद्देश्य केवल अपराधियों को सजा देना नहीं, बल्कि पीड़ितों को समय पर न्याय उपलब्ध कराना भी है। उन्होंने नए कानूनों के मूल मंत्र को ‘न्याय, दंड नहीं’ बताया।

FIR से सुप्रीम कोर्ट तक तीन साल का लक्ष्य

अमित शाह के बयान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा FIR से सुप्रीम कोर्ट तक तीन साल में न्याय दिलाने का लक्ष्य है। इसका सीधा असर देश की आपराधिक न्याय प्रणाली की गति पर पड़ सकता है, यदि जांच, अभियोजन, ट्रायल और अपील की प्रक्रियाएं तय लक्ष्य के अनुरूप तेजी से आगे बढ़ती हैं।

किसी आपराधिक मामले में FIR के बाद पुलिस जांच, चार्जशीट, ट्रायल, निचली अदालत का फैसला और उसके बाद अपील की प्रक्रिया शामिल हो सकती है। कई मामलों में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक अपील पहुंचती है। इसलिए केवल कानून बदलने से समय कम नहीं होगा, बल्कि पुलिस, अभियोजन, फॉरेंसिक संस्थानों और अदालतों के बीच बेहतर समन्वय भी जरूरी होगा।

नए कानूनों की प्रभावी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इन्हें जमीनी स्तर पर कितनी अच्छी तरह लागू किया जाता है। जांच अधिकारियों को तकनीकी प्रशिक्षण, फॉरेंसिक सुविधाओं का विस्तार, डिजिटल रिकॉर्ड की विश्वसनीयता और अदालतों में मामलों के प्रभावी प्रबंधन जैसे पहलू इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

तकनीक और फॉरेंसिक जांच पर जोर

नए आपराधिक कानूनों की चर्चा के दौरान केंद्र सरकार लगातार तकनीक आधारित जांच व्यवस्था पर जोर देती रही है। अपराध की जांच में डिजिटल साक्ष्य, सीसीटीवी फुटेज, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और फॉरेंसिक तकनीकों की भूमिका पहले की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

इसका उद्देश्य जांच की गुणवत्ता सुधारने के साथ-साथ अदालत में साक्ष्यों को अधिक व्यवस्थित तरीके से प्रस्तुत करना है। यदि जांच एजेंसियां समय पर वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाती हैं और अभियोजन पक्ष उन्हें प्रभावी तरीके से अदालत के सामने रखता है, तो मामलों के निपटारे में तेजी आ सकती है।

हालांकि, विशेषज्ञों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि तकनीकी सुधारों के साथ-साथ न्यायिक बुनियादी ढांचे को भी मजबूत किया जाए। अदालतों में लंबित मामलों की संख्या, न्यायाधीशों की उपलब्धता, पुलिस बल की क्षमता और अभियोजन व्यवस्था जैसे विषय भी न्याय की गति को प्रभावित करते हैं।

नशे के खिलाफ अभियान का भी किया जिक्र

कार्यक्रम के दौरान अमित शाह ने देशभर में चल रहे नशीले पदार्थों के खिलाफ अभियान का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सरकार ऐसी विस्तृत योजना पर काम कर रही है, जिससे 31 दिसंबर 2029 के बाद मध्य प्रदेश समेत देश में नशीले पदार्थों के दुरुपयोग और कारोबार के खिलाफ निर्णायक परिणाम हासिल किए जा सकें।

शाह ने नशे के खिलाफ लड़ाई को राष्ट्रीय प्राथमिकता बताते हुए इसके लिए विभिन्न एजेंसियों और राज्यों के बीच समन्वय की जरूरत पर जोर दिया। सरकार पहले भी 2029 तक भारत से नशीले पदार्थों के कारोबार को जड़ से खत्म करने का लक्ष्य सार्वजनिक रूप से रख चुकी है।

न्याय व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती और उम्मीद

अमित शाह का तीन साल में FIR से सुप्रीम कोर्ट तक न्याय का लक्ष्य भारतीय न्याय व्यवस्था के लिए महत्वाकांक्षी लक्ष्य माना जा सकता है। इसका वास्तविक प्रभाव तभी दिखाई देगा जब कानूनों के प्रावधानों के साथ पुलिस जांच, अभियोजन, फॉरेंसिक व्यवस्था और न्यायालयों की कार्यप्रणाली में भी समान गति से सुधार हो।

आम नागरिक के लिए न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी अपेक्षा यही होती है कि शिकायत दर्ज होने के बाद मामले की जांच निष्पक्ष हो, सुनवाई समय पर हो और फैसला अनावश्यक देरी के बिना आए। नए आपराधिक कानूनों से सरकार इसी दिशा में बदलाव लाने का दावा कर रही है।

फिलहाल अमित शाह का बयान न्यायिक प्रक्रिया को तेज करने के सरकारी लक्ष्य के रूप में देखा जाना चाहिए। आने वाले समय में इन कानूनों का जमीनी क्रियान्वयन यह तय करेगा कि FIR से सुप्रीम कोर्ट तक तीन साल में न्याय का लक्ष्य व्यवहार में कितनी प्रभावी तरह हासिल किया जा सकता है।

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