नई दिल्ली: देश में किसानों तक उर्वरकों की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करने और सब्सिडी व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार डिजिटल निगरानी तंत्र को और मजबूत करने की तैयारी में है। सरकार उत्पादन से लेकर आयात, आपूर्ति, भंडारण और खुदरा बिक्री तक उर्वरकों की आवाजाही पर नजर रखने वाली मौजूदा डिजिटल व्यवस्था का विस्तार कर रही है। इसके साथ ही किसानों की खरीद को उनके भूमि रिकॉर्ड से जोड़ने और सब्सिडी से जुड़े लेनदेन की निगरानी को अधिक प्रभावी बनाने के लिए नई सुविधाएं विकसित की जा रही हैं।
उर्वरक विभाग राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (एनआईसी) की तकनीकी सहायता से एकीकृत उर्वरक प्रबंधन प्रणाली (आईएफएमएस) संचालित करता है। यह डिजिटल मंच उर्वरकों की उपलब्धता और वितरण से जुड़ी जानकारी को एक जगह लाने में अहम भूमिका निभा रहा है। अब सरकार इसके दायरे और क्षमताओं को बढ़ाने पर काम कर रही है, ताकि देश के अलग-अलग हिस्सों में उर्वरक की स्थिति की वास्तविक समय के करीब निगरानी की जा सके।
मौजूदा व्यवस्था में 14 करोड़ से अधिक आधार से जुड़े खरीदार और 2.5 लाख से ज्यादा खुदरा विक्रेता पंजीकृत हैं। इस डिजिटल नेटवर्क के जरिये हर साल लगभग सात करोड़ टन उर्वरक की बिक्री से जुड़े आंकड़ों को संसाधित किया जाता है। इसके अलावा करीब दो लाख करोड़ रुपये की वार्षिक उर्वरक सब्सिडी से संबंधित लेनदेन पर भी डिजिटल माध्यम से निगरानी रखी जाती है।
सरकार की नई पहल का एक प्रमुख उद्देश्य किसानों द्वारा खरीदे जाने वाले उर्वरक को उनके भूमि रिकॉर्ड से जोड़ना है। इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि उर्वरक की खरीद वास्तविक कृषि गतिविधि से कितनी जुड़ी है। साथ ही, इससे लाभार्थियों की पहचान और सब्सिडी से संबंधित प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
उर्वरक क्षेत्र में डिजिटल निगरानी को मजबूत करने की जरूरत इसलिए भी महसूस की जा रही है क्योंकि देश में कृषि सीजन के दौरान कुछ क्षेत्रों में उर्वरकों की मांग अचानक बढ़ जाती है। ऐसे समय में किसी इलाके में स्टॉक की कमी या आपूर्ति में देरी किसानों के लिए परेशानी का कारण बन सकती है। नई डिजिटल व्यवस्था के जरिए अधिकारियों को उत्पादन और आयात से लेकर राज्य, जिला तथा खुदरा स्तर तक उपलब्धता की स्थिति एक ही मंच पर देखने में मदद मिलेगी।
इसके लिए विभाग नए डैशबोर्ड तैयार कर रहा है। इन डैशबोर्ड के जरिये राष्ट्रीय स्तर से लेकर राज्य, जिला और खुदरा विक्रेता स्तर तक उर्वरकों से जुड़ी जानकारी को एकीकृत रूप में देखा जा सकेगा। इसमें उत्पादन, आयात, आपूर्ति, भंडार और खुदरा बिक्री से जुड़े आंकड़े शामिल होंगे। इससे किसी क्षेत्र में स्टॉक कम होने या आपूर्ति में असंतुलन की स्थिति का जल्द पता लगाने में मदद मिल सकती है।
डिजिटल निगरानी का एक अहम पहलू सब्सिडी से जुड़े लेनदेन पर नजर रखना भी है। उर्वरक सब्सिडी पर सरकार हर साल बड़ी राशि खर्च करती है। इसलिए यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि सब्सिडी का लाभ निर्धारित व्यवस्था के अनुसार किसानों तक पहुंचे और वितरण श्रृंखला में किसी तरह की अनियमितता की गुंजाइश कम हो।
आईएफएमएस के विस्तार से सरकार को उर्वरकों की मांग और उपलब्धता के बीच बेहतर तालमेल बनाने में भी मदद मिलने की उम्मीद है। यदि किसी राज्य या जिले में किसी विशेष उर्वरक की मांग बढ़ती है, तो संबंधित आंकड़ों के आधार पर आपूर्ति व्यवस्था को समायोजित करना आसान हो सकता है।
कुल मिलाकर, सरकार का प्रयास उर्वरक प्रबंधन को अधिक डेटा आधारित और पारदर्शी बनाने का है। उत्पादन और आयात से लेकर किसान की खरीद तक पूरी आपूर्ति श्रृंखला को डिजिटल निगरानी से जोड़ने पर न केवल स्टॉक प्रबंधन बेहतर हो सकता है, बल्कि सब्सिडी व्यवस्था में जवाबदेही भी बढ़ सकती है। आने वाले समय में भूमि रिकॉर्ड और उर्वरक खरीद के बीच डिजिटल कड़ी मजबूत होने से कृषि क्षेत्र में उर्वरक वितरण की निगरानी का तरीका भी बदलने की संभावना है।