नयी दिल्ली: इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन क्लिनिकल कार्डियोलॉजी (पीजीडीसीसी) को राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग से आधिकारिक मान्यता मिलना देश की चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। लगभग दो दशकों से जारी कानूनी और शैक्षणिक विवाद के बाद इस निर्णय ने न केवल अनिश्चितता को समाप्त किया है, बल्कि इस कोर्स से जुड़े हजारों चिकित्सकों और छात्रों को भी स्पष्ट दिशा प्रदान की है।
एनएमसी ने इस कार्यक्रम को नए नाम “क्लिनिकल कार्डियो फिजिशियन (नॉन-इनवेसिव) पीजीडीसीसीपी (एनआई)” के रूप में पुनः मान्यता दी है। यह दो वर्षीय पोस्ट-एमबीबीएस कोर्स है, जिसका उद्देश्य चिकित्सा क्षेत्र में विशेष रूप से कार्डियोलॉजी सेवाओं में मौजूद कमी को पूरा करना है। इस पाठ्यक्रम के माध्यम से डॉक्टरों को हृदय रोगों के नॉन-इनवेसिव निदान और उपचार में प्रशिक्षित किया जाता है, जिससे वे प्राथमिक और द्वितीयक स्वास्थ्य सेवाओं में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकें।
इस संबंध में इंडियन एसोसिएशन ऑफ क्लिनिकल कार्डियोलॉजिस्ट के अध्यक्ष डॉ. कपिल खन्ना और इंडियन एकेडमी ऑफ इकोकार्डियोग्राफी से जुड़े डॉ. राकेश गुप्ता ने संयुक्त रूप से जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि यह निर्णय विशेष रूप से ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, जहां हृदय रोग विशेषज्ञों की भारी कमी लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में हृदय संबंधी बीमारियां मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल हैं, लेकिन इसके अनुपात में प्रशिक्षित कार्डियोलॉजिस्ट की संख्या बेहद कम है। 140 करोड़ से अधिक की आबादी वाले देश में केवल 5,000 से 6,000 के बीच ही विशेषज्ञ उपलब्ध हैं, जो इस क्षेत्र में गंभीर असंतुलन को दर्शाता है। ऐसे में यह कार्यक्रम प्रशिक्षित चिकित्सकों की संख्या बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
इस मान्यता के बाद उम्मीद की जा रही है कि अधिक डॉक्टर इस कोर्स को अपनाएंगे और देश के दूर-दराज के इलाकों में भी गुणवत्तापूर्ण हृदय चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध हो सकेंगी। कुल मिलाकर, यह कदम स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार और सुलभता की दिशा में एक सकारात्मक और दूरगामी प्रभाव डालने वाला साबित हो सकता है।