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डिजाइन चूक से मुंबई मेट्रो पर संकट,250 करोड़ का अतिरिक्त बोझ

मुंबई: मुंबई मेट्रो की एक महत्वपूर्ण परियोजना में डिजाइन से जुड़ी कथित तकनीकी चूक अब बड़ी चुनौती बनती दिखाई दे रही है। मेट्रो-7ए के एयरपोर्ट कॉलोनी क्षेत्र में तैयार किए गए एलिवेटेड वायाडक्ट का एक हिस्सा निर्धारित ऊंचाई सीमा से करीब 2.5 मीटर अधिक ऊंचा हो गया है। इसके कारण परियोजना के करीब एक किलोमीटर […]

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  • August 31, 2026 5:50 pm IST, Published 2 hours ago

मुंबई: मुंबई मेट्रो की एक महत्वपूर्ण परियोजना में डिजाइन से जुड़ी कथित तकनीकी चूक अब बड़ी चुनौती बनती दिखाई दे रही है। मेट्रो-7ए के एयरपोर्ट कॉलोनी क्षेत्र में तैयार किए गए एलिवेटेड वायाडक्ट का एक हिस्सा निर्धारित ऊंचाई सीमा से करीब 2.5 मीटर अधिक ऊंचा हो गया है। इसके कारण परियोजना के करीब एक किलोमीटर लंबे हिस्से को तोड़कर नए सिरे से बनाने की स्थिति पैदा हो सकती है।

मामला विमान परिचालन से जुड़ी सुरक्षा सीमाओं से संबंधित है। एयरपोर्ट क्षेत्र के आसपास किसी भी निर्माण की ऊंचाई को लेकर निर्धारित मानकों का पालन करना जरूरी होता है, ताकि विमानों की आवाजाही में किसी तरह का जोखिम न पैदा हो। मेट्रो-7ए के संबंधित हिस्से में निर्माण के दौरान ऊंचाई की गणना और डिजाइन को लेकर हुई चूक अब परियोजना के लिए गंभीर समस्या बन गई है।

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, वायाडक्ट का ढांचा एयरपोर्ट से संबंधित निर्धारित सुरक्षा सीमा से लगभग 2.5 मीटर ऊपर चला गया। ऐसे में अब परियोजना से जुड़े अधिकारियों और एजेंसियों के सामने दो विकल्प हैं। पहला, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण यानी एएआई से किसी तरह की तकनीकी या नियामकीय राहत मिल जाए। दूसरा विकल्प यह है कि ऊंचाई मानकों के अनुरूप पूरे प्रभावित हिस्से को तोड़कर दोबारा तैयार किया जाए।

यदि एएआई की ओर से राहत नहीं मिलती है तो लगभग एक किलोमीटर लंबे एलिवेटेड स्ट्रेच को हटाकर नए डिजाइन के अनुसार निर्माण करना पड़ सकता है। इससे परियोजना की लागत बढ़ने के साथ निर्माण पूरा होने की समयसीमा भी प्रभावित होने की आशंका है। अनुमान के मुताबिक इस बदलाव से करीब 250 करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ सकता है।

मेट्रो परियोजनाओं में किसी बड़े ढांचे को दोबारा बनाना केवल निर्माण लागत तक सीमित नहीं रहता। इसके लिए पहले से तैयार संरचना को हटाना, मलबा निकालना, नए डिजाइन को मंजूरी दिलाना और दोबारा निर्माण शुरू करना पड़ता है। साथ ही प्रभावित क्षेत्र में यातायात, सुरक्षा और अन्य निर्माण गतिविधियों का समन्वय भी चुनौती बन सकता है।

एयरपोर्ट के नजदीक होने के कारण मेट्रो-7ए का यह हिस्सा सामान्य शहरी निर्माण से अलग महत्व रखता है। यहां निर्माण की ऊंचाई से संबंधित मानकों का पालन सीधे विमान सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। इसलिए किसी भी वैकल्पिक समाधान को लागू करने से पहले संबंधित तकनीकी और सुरक्षा एजेंसियों की मंजूरी आवश्यक होगी।

परियोजना के लिए मौजूदा स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मेट्रो नेटवर्क के विस्तार का उद्देश्य मुंबई के अलग-अलग हिस्सों को बेहतर सार्वजनिक परिवहन से जोड़ना है। एयरपोर्ट क्षेत्र से जुड़ा मेट्रो कॉरिडोर यात्रियों के लिए भी महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। ऐसे में निर्माण में किसी तरह की देरी का असर केवल परियोजना की लागत पर नहीं, बल्कि यात्रियों को मिलने वाली सुविधा की शुरुआत पर भी पड़ सकता है।

दूसरी ओर, यदि एएआई मौजूदा ढांचे को लेकर किसी समाधान या राहत की अनुमति देता है तो करीब एक किलोमीटर हिस्से को तोड़ने की जरूरत टाली जा सकती है। इससे परियोजना पर पड़ने वाले अतिरिक्त वित्तीय और समय संबंधी दबाव को कम किया जा सकेगा। हालांकि, किसी भी तरह की राहत का निर्णय संबंधित सुरक्षा मानकों और तकनीकी आकलन के आधार पर ही संभव होगा। इस पूरे मामले ने बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में डिजाइन, सर्वेक्षण और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय की अहमियत को भी सामने ला दिया है। खासतौर पर एयरपोर्ट जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के पास निर्माण शुरू करने से पहले ऊंचाई संबंधी सभी मानकों की कई स्तरों पर जांच जरूरी होती है।

करीब 250 करोड़ रुपये के संभावित अतिरिक्त खर्च का अनुमान इस चूक की गंभीरता को बताता है। अगर प्रभावित हिस्से को दोबारा बनाना पड़ा तो परियोजना के बजट पर दबाव बढ़ सकता है और निर्माण कार्यक्रम को भी नए सिरे से तय करना पड़ सकता है। फिलहाल निगाह एएआई के रुख पर टिकी है। यदि मौजूदा संरचना को किसी सुरक्षित तकनीकी समाधान के साथ स्वीकार करने की अनुमति मिलती है तो बड़ी तोड़फोड़ से बचा जा सकता है। लेकिन यदि सुरक्षा मानकों में कोई समझौता संभव नहीं हुआ तो करीब एक किलोमीटर वायाडक्ट को दोबारा बनाना पड़ सकता है।

मुंबई मेट्रो-7ए से जुड़ा यह मामला बताता है कि बड़े शहरी परिवहन प्रोजेक्ट में छोटी सी डिजाइन संबंधी गलती भी लागत, समय और निर्माण योजना पर बड़ा असर डाल सकती है। अब संबंधित एजेंसियों के फैसले से तय होगा कि परियोजना को अतिरिक्त खर्च और देरी के साथ आगे बढ़ना होगा या मौजूदा ढांचे के लिए कोई सुरक्षित समाधान निकाला जा सकेगा।

 

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