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भोजपुरी नाटक ‘माइंडसेट’ का हिंदी मंचन, अंग्रेजी की मानसिकता पर व्यंग्य

नई दिल्ली : रंगश्री की ओर से प्रस्तुत मूल भोजपुरी नाटक ‘माइंडसेट’ का हिंदी रूपांतरण और मंचन दर्शकों के बीच चर्चा का विषय बना। 19 अगस्त 2026 को लिटिल थिएटर ग्रुप (LTG) के ब्लैंक कैनवास सभागार में हुए इस मंचन को दर्शकों से उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिली। नाटक ने हास्य और व्यंग्य के जरिए समाज में भाषा […]

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  • August 20, 2026 2:00 pm IST, Published 18 minutes ago

नई दिल्ली : रंगश्री की ओर से प्रस्तुत मूल भोजपुरी नाटक ‘माइंडसेट’ का हिंदी रूपांतरण और मंचन दर्शकों के बीच चर्चा का विषय बना। 19 अगस्त 2026 को लिटिल थिएटर ग्रुप (LTG) के ब्लैंक कैनवास सभागार में हुए इस मंचन को दर्शकों से उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिली। नाटक ने हास्य और व्यंग्य के जरिए समाज में भाषा को लेकर बनी धारणाओं पर सवाल उठाए।

‘माइंडसेट’ की केंद्रीय विषयवस्तु अंग्रेजी भाषा को अधिक प्रतिष्ठित और हिंदी या भारतीय भाषाओं को कमतर समझने वाली सामाजिक सोच के इर्द-गिर्द घूमती है। नाटक यह सवाल सामने रखता है कि भाषा वास्तव में ज्ञान और विचार व्यक्त करने का माध्यम है या फिर समाज में व्यक्ति की हैसियत तय करने का एक जरिया बन गई है।

मूल रूप से भोजपुरी में तैयार किए गए इस नाटक का हिंदी रूपांतरण इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि इससे इसकी विषयवस्तु हिंदी भाषी दर्शकों के बड़े वर्ग तक पहुंची। प्रस्तुति के दौरान कलाकारों ने संवाद, हास्य और व्यंग्य के माध्यम से भाषा से जुड़े पूर्वाग्रहों तथा दिखावे की प्रवृत्ति को मंच पर प्रभावी ढंग से सामने रखा।

नाटक के निर्देशक और रंगश्री के संस्थापक डॉ. महेंद्र प्रसाद सिंह ने कहा कि ‘माइंडसेट’ को केवल भाषा केंद्रित प्रस्तुति के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार नाटक उस सोच की पड़ताल करता है जिसमें लोग अपनी भाषा, संस्कृति और पहचान को ही कमतर आंकने लगते हैं। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी सीखना या उसका ज्ञान हासिल करना गलत नहीं है, लेकिन अपनी मातृभाषा और भारतीय भाषाओं को लेकर हीन भावना पैदा होना चिंता का विषय है।

मंचन में कलाकारों ने भाषा से जुड़े सामाजिक पूर्वाग्रहों को अभिनय के माध्यम से सामने रखा। मुख्य भूमिकाओं में डॉ. महेंद्र प्रसाद सिंह, सौमित्र वर्मा, अखिलेश कुमार पाण्डेय और कुमार रुस्तम ने अभिनय किया। वहीं प्रवीण कुमार और विनय कांत की प्रस्तुति ने भी नाटक को प्रभावी बनाने में योगदान दिया।

नाटक की प्रस्तुति में हास्य और गंभीर सामाजिक संदेश का संतुलन दिखाई दिया। कई दृश्यों और संवादों ने दर्शकों को हंसाया, जबकि कुछ प्रसंगों ने भाषा और सामाजिक प्रतिष्ठा के बीच बन चुके संबंध पर विचार करने के लिए प्रेरित किया। यही मिश्रण नाटक को केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रखता, बल्कि दर्शकों को सामाजिक व्यवहार पर सोचने का अवसर भी देता है।

मंच की प्रकाश व्यवस्था की जिम्मेदारी अशोक यादव ने संभाली, जबकि मंच व्यवस्था विजय कुमार और राहुल प्रशांत सिंह ने की। पूरी प्रस्तुति में तकनीकी पक्ष ने कलाकारों के अभिनय और संवादों को प्रभावी तरीके से दर्शकों तक पहुंचाने में सहयोग किया।

डॉ. महेंद्र प्रसाद सिंह के मुताबिक, रंगश्री लंबे समय से रंगमंच के जरिए युवा पीढ़ी में रचनात्मकता, सामाजिक चेतना और अपनी भाषा-संस्कृति के प्रति सम्मान की भावना विकसित करने का प्रयास कर रही है। ‘माइंडसेट’ को भी इसी उद्देश्य से तैयार किया गया है। नाटक के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि किसी भाषा का महत्व केवल उसके सामाजिक रुतबे से तय नहीं किया जाना चाहिए।

 

 

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मंचन के दौरान रंगकर्मियों, साहित्यकारों, कला प्रेमियों और दिल्ली के रंगमंच से जुड़े लोगों की मौजूदगी रही। दर्शकों ने नाटक की प्रस्तुति और विषय को मौजूदा सामाजिक परिस्थितियों से जुड़ा हुआ बताया। खास तौर पर भाषा के आधार पर लोगों के बीच बनने वाली सामाजिक दूरी और प्रतिष्ठा की धारणा को लेकर नाटक की विषयवस्तु को प्रासंगिक माना गया।

रंगश्री की योजना ‘माइंडसेट’ जैसे सामाजिक सरोकार वाले नाटकों को आगे विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों और अन्य सांस्कृतिक मंचों तक ले जाने की है। संस्था का मानना है कि रंगमंच मनोरंजन के साथ सामाजिक संवाद का भी प्रभावी माध्यम बन सकता है।

‘माइंडसेट’ का हिंदी मंचन इसी दिशा में एक प्रयास के रूप में सामने आया। नाटक ने यह संदेश दिया कि दूसरी भाषाओं का ज्ञान हासिल करना प्रगति का हिस्सा हो सकता है, लेकिन इसके लिए अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति सम्मान को कम करना जरूरी नहीं है। इस तरह प्रस्तुति ने भाषा, पहचान और सामाजिक मानसिकता के बीच संबंध पर दर्शकों के सामने एक सार्थक सवाल खड़ा किया।

 

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